16. बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब हो गए? - Page 160

अध्याय 16

बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब बने?

पूर्ववर्ती शोध और विचार-विमर्श से यह बात सिद्ध हो गई है कि एक समय था जब भारत के प्रत्येक गांव के दो हिस्से होते थे। एक बसे हुए लोगों का दूसरा छितरे हुए लोगों का यद्यपि दोनों अलग-अलग रहते थे। बसे हुए लोग गांव के अन्दर और छितरे हुए लोग गांव के बाहर तो भी दोनों के पारस्परिक सामाजिक आचार व्यवहार में किसी प्रकार की कोई बाधा न थी। गाय को पवित्र घोषित करने और गोमांस भक्षण निषिद्ध कर दिए जाने से समाज दो हिस्सों में बंट गया। बसी हुई जातियां छूत जातियां बन गईं और छितरे हुए लोग अछूत जातियां। छितरे हुए आदमी अछूत कब समझे जाने लगे, यह अंतिम प्रश्न विचारणीय है। छुआछूत की उत्पत्ति की निश्चित तिथि का निर्णय करने में जो कठिनाइयां हैं वे प्रकट ही हैं। अस्पृश्यता सामाजिक मनोविज्ञान का एक पहलू है। यह एक दल का दूसरे दल के प्रति सामाजिक घृणा भाव है। यह सामाजिक मनोविज्ञान का ही एक विकास है जिसे अपना यह स्वरूप बनाने में कुछ समय लगा ही होगा। इसलिए किसी भी एक ऐसी चीज के अस्तित्व में लाने की निश्चित तिथि का निर्णय करने का कोई भी दावा नहीं कर सकता, जो सम्भवतः बीज रूप में उत्पन्न होकर रक्त बीज ही बन गया और सर्वग्राही बन बैठा। अस्पृश्यता का बीज कब पनपा होगा यह कल्पनातीत है। कोई निश्चित तिथि तो क्या उसके आसपास का कोई काल निश्चित नहीं किया जा सकता।

कोई अधिक सीमा निश्चित करने के संबंध में जो पहली बात ध्यान देने की है वह यह है कि जो अंत्यज कहलाते हैं उनका उल्लेख वेद में आता है, लेकिन उन्हें जब अछूत नहीं समझा जाता था तो उन्हें अपवित्र भी नहीं माना जाना था। इस निष्कर्ष के समर्थन में काणे ख्1, का यह कथन उद्धृत किया जा सकता हैःµ

आरंभिक वैदिक वाघ्यम में ऐसे अनेक नाम आते हैं जिन्हें स्मृतिकारों ने अंत्यज कहा है। ऋग्वेद (8.8.38) में चर्मणा आया है। चांडाल और पौल्कस वाजसनेयि

  1. धर्म सूत्र, खंड 2, भाग 1, पृष्ठ 165