16. बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब हो गए? - Page 161

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

संहिता में आए हैं। वेया अथवा वेप्ता। ऋग्वेद में विदलकार अथवा बीदलकीर स्मृतियों के अनुसार बुरुद वाजस्नेही संहिता में तैत्तिरीय ब्राह्मण में आए हैं। वासहपलपुली, स्मृतियों में रजकों की प्रतिनिधि वाजसनेयि संहिता में किंतु इन उद्धरणों में इस बात की ओर कहीं इशारा नहीं है कि यदि ये लोग जातियां भी बन गए थे तो क्या वे लोग अछूत थे।

इस प्रकार वैदिक काल में कहीं कोई अस्पृश्यता नहीं थी। जहां तक धर्म सूत्रों के काल की बात है हम देख चुके हैं कि उस समय अपवित्रता थी किंतु अस्पृश्यता नहीं थी।

क्या मनु के समय में अस्पृश्यता ख्1, थी? इस प्रश्न का बिना सोचे समझे उत्तर नहीं दिया जा सकता। मनु स्मृति का एक श्लोक है, जिसमें मनु का कथन है कि केवल चार वर्ण हैं पांचवा है ही नहीं। यह श्लोक एक पहेली का रूप लिए हुए है। कौन कह सकता है कि इसका ठीक तात्पर्य क्या है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह विवाद चातुर्वर्ण्य को लेकर किसी जाति के संबंध में रहा होगा। यह भी उतना ही स्पष्ट है कि विवाद का केन्द्र-बिंदु क्या रहा होगा? संक्षेप में कहना हो तो विषय यही था कि जाति विशेष को चातुर्वर्ण्य के भीतर स्वीकार किया जाए अथवा वह चातुर्वर्ण्य के बाहर पांचवी जाति मानी जाए? यह सब एकदम स्पष्ट है। अस्पष्ट तो यही है कि यह विवाद किस एक जाति के संबंध में है? इसलिए जिस जाति के संबंध में यह विवाद है मनु ने उसका विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया।

यह श्लोक इसलिए भी रहस्यमय अथवा गूढ़ार्थक है क्योंकि मनु का निर्णय भी अस्पष्ट है। मनु का निर्णय है कि कोई पांचवां वर्ण नहीं है। यह कथन अभिधा में है, जो हर किसी की समझ में आता है। लेकिन जब इस निर्णय को उस जाति विशेष पर लागू किया जाए, जिसका दर्जा विवादग्रस्त विषय था तो इसका क्या अर्थ होता है? प्रकट ही है कि इसके लाक्षणिक अर्थ होते हैं। इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि कोई पांचवां वर्ण नहीं है इसलिए वह जाति विशेष इन्हीं चारों वर्णों में से किसी एक के अंतर्गत स्वीकार की जानी चाहिए। किंतु इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि वर्ण चार ही होते हैं, पांचवां हो नहीं सकता, इसलिए उस जाति विशेष को एक दम चातुर्वर्ण्य के बाहर माना जाए।

रूढि़वादी हिंदू की परंपरागत व्याख्या है कि मनुस्मृति के इस उद्धरण का अछूतों से संबंध है। यह अछूतों का ही दर्जा था जो विवाद का विषय था, और अछूतों के दर्जे के संबंध में ही मनु का यह निर्णय है। यह व्याख्या इतनी जटिल हो गई है कि

  1. मनु स्मृति, अध्याय-10, श्लोक 4