बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब बने?
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इससे यह हुआ कि हिंदू दो वर्गों में विभाजित हो गए। सवर्ण हिंदू तथा अवर्ण हिंदू, अर्थात् अछूत चातुर्वर्ण्य से अलग। प्रश्न है कि क्या यह मत ठीक है? मनु के इस श्लोक का तात्पर्य किससे है? क्या इसका तात्पर्य अछूतों से है? संभव है कि इस विषय की चर्चा का विचाराधीन विषय से कोई संबंध अथवा मेल न हो।
लेकिन ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यदि श्लोक का संबंध अछूतों से ही है तो इससे यह सिद्ध हो सकता है कि मनु के समय में छुआछूत थी। यह एक ऐसी अवस्था है जिसका विचारणीय विषय से सीधा संबंध है। इसलिए इस विषय को लेकर विवेचन करना ही होगा।
मेरा निश्चित मत है कि उक्त व्याख्या गलत है। मेरी मान्यता है कि इस श्लोक का अछूतों से कोई भी संबंध नहीं है। मनु ने यह कहीं नहीं कहा है कि वह कौन सी जाति थी जिसका दर्जा विवाद का विषय था और जिसके विषय में मनु ने अपना निर्णय दिया। क्या यह अछूतों की जाति थी अथवा यह कोई दूसरी जाति थी? अपने मत के समर्थन में कि इस श्लोक का अछूतों से कुछ भी संबंध नहीं है, मैं दो बातों पर निर्भर करता हूं-पहली बात तो यही है कि मनु के समय में छुआछूत नहीं थी, उस समय केवल अपवित्रता/अशुचिता थी। चाण्डाल के प्रति मनु का भाव एकमात्र घृणा का है। वह चांडाल भी अपवित्र ही था। ऐसा होने पर इस श्लोक का किसी तरह भी अस्पृश्यता से कोई संबंध नहीं हो सकता। दूसरी बात यह है कि हमारे पास इस बात के समर्थन में प्रमाण हैं कि इस श्लोक का संबंध अछूतों से नहीं दासों से है। इस मत का आधार नारद स्मृति के उस श्लोक की भाषा से है जिसका उद्धरण इसी पुस्तक के सातवें अध्याय में दिया गया है जहां छुआछूत का आधार पेशा कहा गया है। यह बात ध्यान देने की है कि नारद स्मृति दासों का पांचवा वर्ण मान कर उनका उल्लेख करती है। यदि नारद स्मृति में पांचवे वर्ण का अर्थ दास हो सकता है तो कोई कारण नहीं कि मनुस्मृति में पांचवे वर्ण का अर्थ दास न हो। यदि तर्क ठीक है तो इससे यह कथन निरर्थक हो जाता है कि मनु के समय में अस्पृश्यता थी और मनु अछूतों को वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत लेने को तैयार न थे। इन कारणों से मनुस्मृति के इस श्लोक का संबंध अछूतपन से नहीं है और इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मनु के समय में छुआछूत थी।
इस प्रकार हम निश्चयात्मक रूप से अस्पृश्यता के काल की ऊपरी सीमा का निर्णय कर सकते हैं। हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि मनुस्मृति ने छुआछूत का आदेश नहीं दिया तो भी एक महत्त्वपूर्ण प्रशन बाकी रह जाता है। मनुस्मृति का काल क्या है? इस प्रश्न के उत्तर के बिना एक सामान्य आदमी के लिए किसी विशेष काल में अस्पृश्यता के होने के बारे में कुछ भी कह सकना कठिन है। मनुस्मृति