16. बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब हो गए? - Page 163

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

के बारे में पंडितों में मतैक्य नहीं। कुछ इसे अत्यंत प्राचीन मानते हैं और कुछ अत्यंत अर्वाचीन। सभी बातों पर विचार करके प्रो. बूहलर ने मनुस्मृति का एक समय निश्चित किया है जो युक्तिसंगत प्रतीत होता है। प्रो. बूहलर ने मनुस्मृति के काल का निर्धारण किया है जो सत्य प्रतीत होता है। प्रो. बूहलर के अनुसार जो मनुस्मृति जिस रूप में हमें जो मिलती है ईसा की दूसरी शताब्दी में अस्तित्व में आई ख्1, । प्रो. बूहलर ने ही मनुस्मृति के लिए इतना समीप का समय निश्चित नहीं किया। श्री दफतरी भी इसी परिणाम पर पहुंचे हैं। उनका मत है कि मनुस्मृति 185 ई. पूर्व के बाद अस्तित्व में आई। इससे पहले नहीं। श्री दफतरी का तर्क है कि मौर्य वंश के बौद्ध नरेश महाराज बृहद्रथ की हत्या उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्पमित्र ने की थी। मनुस्मृति का इस घटना से सीधा संबंध है। क्योंकि यह दुर्घटना 185 ई. पूर्व में हुई इसलिए मनुस्मृति 185 ई. पूर्व के बाद लिखी गई होगी। ऐसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष का समर्थन करने के लिए पुष्पमित्र द्वारा बृहद्रथ मौर्य की हत्या और मनुस्मृति के लिखे जाने में जो संबंध रहा है उसे जोरदार अकाट्य प्रमाणों से सिद्ध करने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से श्री दफतरी ने ऐसा नहीं किया, परिणामस्वरूप उनका निष्कर्ष निराधार प्रतीत होता है। इस प्रकार के संबंध को सिद्ध करना अनिवार्य है। सौभाग्य से इस संबंध में प्रमाणों की कमी नहीं है।

पुष्पमित्र द्वारा बृहद्रथ मौर्य की हत्या की ओर किसी का ध्यान नहीं जाना दुर्भाग्य का विषय है। इस घटना की ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए उतना ध्यान आकर्षित नहीं हुआ। इतिहासकारों ने इसे दो व्यक्तियों की व्यक्तिगत शत्रुता का सा रूप देकर एक सामान्य सी घटना मान लिया है। इसके परिणामों की ओर ध्यान दें तो यह युगान्तकारी घटना थी। इस घटना का महत्त्व इस बात से नहीं मापा जा सकता कि यह किसी राजवंश की थीµशुंगों द्वारा मौर्य का स्थान ग्रहण करना। यह फ्रांस की राज्य क्रांति से भी यदि बड़ी नहीं तो उतनी ही बड़ी राजनैतिक क्रांति अवश्य थी। यह एक क्रांति थीµलाल क्रांति। इसका उद्देश्य था बौद्ध राजाओं का तख्ता उलट देना। इसके सूत्र संचालक थे ब्राह्मण। पुष्पमित्र द्वारा बृहद्रथ की हत्या इस बात की द्योतक है।

विजयी ब्राह्मण को अनेक चीजों की आवश्यकता थी। स्वाभाविक तौर पर इसके लिए यह आवश्यक था कि चातुर्वर्ण्य को देश का विधान बना दिया जाए। बौद्ध इसे अस्वीकार करते ही थे। इसे इस बात की भी आवश्यकता थी कि जिस पशु-बलि को बौद्धों ने रोक दिया था उसे विधान का रूप दे दिया जाए। लेकिन इसके अतिरिक्त और भी कुछ चाहिए था। बौद्ध नरेशों के विरुद्ध यह क्रांति लाकर ब्राह्मणवाद ने देश के ऐसे दो प्रचलित नियमों का उल्लंघन कर दिया जिनको सभी लोग पवित्र और

  1. बूहलर, लाइफ ऑफ मनु (एस.बी.ई.), खण्ड-15, भूमिका सी. एस. एन.