बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब बने?
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अनुल्लंघनीय मानते थे। पहला यह नियम बनाया कि ब्राह्मण द्वारा शस्त्र का स्पर्श करना भी पाप है। बनाए गए दूसरे नियम के अनुसार राजा का शरीर पवित्र था और राज हत्या पाप। विजयी ब्राह्मणवाद को अपने पापों का समर्थन करने के लिए एक पवित्र ग्रंथ की आवश्यकता थी जो सभी के लिए प्रमाणस्वरूप हो। मनुस्मृति की ओर ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता यह है कि वह न केवल चातुर्वर्ण्य को देश का विधान बताती है और न केवल पशु बलि को कानून की दृष्टि से उचित ठहराती है, किंतु यह भी बताती है कि ब्राह्मण को कब हाथ में शस्त्र लेना चाहिए और वह राजा की हत्या करके भी अधर्म नहीं करता। इस मामले में मनुस्मृति ने वह काम किया जो पहले की किसी स्मृति ने नहीं किया। यह नितांत नया मार्ग विशुद्ध नवीन सिद्धांत है। मनुस्मृति को ऐसा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका केवल एक ही उत्तर है कि पुष्पमित्र ने जो राजक्रांति की थी उसका दार्शनिक समर्थन किया जाए। पुष्पमित्र और मनुस्मृति के इस नए सिद्धांत के बीच के संबंध से यही प्रकट होता है कि मनुस्मृति 185 ई. पूर्व के कुछ बाद में अस्तित्व में आई। यह ऐसी तिथि है कि प्रो. बूहलर की तिथि से बहुत दूर नहीं है। मनुस्मृति का काल निर्णय हो जाने पर हम कह सकते हैं कि दूसरी शताब्दी में अस्पृश्यता नहीं थी।
अब हम अस्पृश्यता की उत्पत्ति के निर्धारण के बाद की सीमा की ओर ध्यान दें। इसके लिए हमें चीनी यात्रियों के प्रसंग देखने होंगे, जो भारत आए और जिन्होंने अपने समय के भारतीय रीति-रिवाजों का उल्लेख किया। इसमें से फाहियान नामक चीनी यात्री का कथन विशेष है।
वह सन् 400 ई. में भारत आए जो कुछ उसने देखा और लिखा, अपने उस वर्णन में एक जगह वह लिखता है ख्1, ःµ
‘‘इस (मथुरा) से दक्षिण में विख्यात मध्य देश है। यहां की जलवायु ऊष्ण और सम शीतोष्ण है। यहां न पाला पड़ता है न बर्फ गिरती है। लोग समृद्धशाली हैं। उन पर व्यक्तिकर नहीं है तथा दूसरे राजकीय प्रतिबंध से भी मुक्त हैं। जो शासकीय जमीन जोतते रहना चाहें तो जोतते रह सकते हैं, यदि बंद करना चाहें तो बंद कर सकते हैं। राजा बिना शारीरिक दंड के शासन करते हैं। अपराधियों को परिस्थिति के अनुसार हलका या भारी जुर्माना किया जाता है। बार-बार विद्रोह करने पर भी केवल उनका दाहिना हाथ ही काटा जाता है। राजा के दाएं रहने वाले उसके अंगरक्षकों का निश्चित वेतन है। देश भर में केवल चांडालों के अतिरिक्त कोई भी न किसी जीव की हत्या करता है न सुरापान करता है और न लहसुन या प्याज खाता है। चांडालों को फ्कुपुषय् कहा जाता है। वे दूसरों से अलग रहते हैं। यदि वे बस्ती या बाजार में प्रवेश करते हैं तो वे अपने आप को
- बुद्धिस्ट रिकार्डस इन वेस्टर्न इण्डिया बिल-भूमिका, पृ. 38