बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब बने?
151
जहां-तहां उठने वाले घरों के धुएं से लग सकता था, घर में चारों ओर खोपडि़यां लटकी हुई थीं_ (627) रास्ते में कूड़े के ढेर पर हड्डियां पड़ी हुईं, झोपडि़यों के आंगन में रक्त, चर्बी और छिछड़ों का ढेर, उनका जीवन शिकार का भोजन, मांस, चिकनाई, चर्बी, वस्त्र मोटे, खुरदरे रेशम के, आसन सूखे चमड़े के व घरों के पहरेदार कुत्ते, सवारी के लिए पशु-गाय, पुरुषों का काम शराब और स्त्री का धंधा, देवताओं के लिए रक्त की बलि, पशु वध। यह जगह साक्षात नरक का दृश्य था।य्
ऐसी बस्ती से चांडाल कन्या अपने तोते के साथ राजा शूद्रक के महल को जाती है। राजा शूद्रक अपने दरबारियों के साथ दरबार में विराजमान हैं। द्वारपालिका अंदर जाती है और निम्न प्रकार से सूचना देती है ख्1, ःµ
‘‘महाराज, दक्षिण से आई हुई एक चांडाल कन्या द्वारा पर खड़ी है। वह उस त्रिशंकु वंश की शोभा है जो आकाश पर चढ़ा हुआ था, किंतु क्रोधी इन्द्र के व्रज प्रहार के कारण भूमि पर आ गिरा। उसके पास पिंजरे में एक तोता है और वह मेरे द्वारा श्रीमन् से यह निवेदन करती हैःµ
महाराज आप समुद्र की तरह संसार के सारे रत्नों को ग्रहण करने के अधिकारी हैं। यह समझ कर कि यह तोता संसार का अद्भुत आश्चर्य और अमूल्य रत्न है मैं आपको समर्पित करने के लिए आई हूं और आपके दर्शन करना चाहती हूं। हे राजन आपने उसका संदेश सुन लिया। अब आप जो आज्ञा दें।य् इस प्रकार उसने अपना भाषण दिया। राजा ने उत्सुकतावश दरबारियों की ओर देखा और फ्क्यों नहीं, उसे आने दोय् कह कर अपनी आज्ञा दे दी। तब राजाज्ञा पाते ही द्वारपालिका ने उस चांडाल कन्या को अंदर आने दिया। वह अंदर चली आई।
राजा और उसके दरबारियों ने पहले तो उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। राजा का ध्यान आकर्षित करने के लिए उसने चित्रित फर्श को बांस से ठोका। इसके आगे बाण उसके सौन्दर्य का वर्णन ख्2, करता हैः-
फ्तब राजा ने उधर देखो कह कर द्वारपालिका के निर्देशानुसार उस चांडाल कन्या की वेशभूषा की ओर बड़े ध्यान से देखा। उसके आगे-आगे एक आदमी चल रहा था जिसके बालों को उसकी दीर्घ आयु ने सफेद कर दिया था, जिसकी आंखें कमल की तरह लाल थीं, जिसके अंग सतत तारुण्य होने पर भी लगातार परिश्रम के कारण मजबूत थे, उसकी आकृत यद्यपि मातंग की थी तो भी उपेक्षणीय नहीं थी, और जो दरबार के योग्य श्वेत वस्त्र धारण किए हुए था उसके पीछे-पीछे एक चांडाल लड़का
कादम्बरी (रीडिंग ट्रांसलेशन), पृ. 6
वही, पृष्ठ 8-10