16. बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कब हो गए? - Page 167

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

था, जिसके बाल उसके दोनों कंधों पर लटके हुए थे। उसके हाथ में एक पिंजरा था। पिंजरे की सीखें स्वर्ण की थीं तो भी वह तोते की कलंगी की छाया पड़ने के कारण नीलम की तरह चमकती थी। वह चांडाल कन्या स्वयं अपने सांवले रंग के कारण उस कृष्ण के सदृश थी जिसने एक बार असुरों से अमृत छीनने के लिए स्त्री का वेश धारण किया था। वह ऐसी प्रतीत होती थी मानो नीलम की प्रतिमा चली जा रही हो। उसके नीचे वस्त्रों पर जो एड़ी तक लटके हुए थे लाल रंग के रेशम की चादर पड़ी थी मानो संध्याकालीन सूर्य नीले कमल पर चमक रहा हो। उसके कानों से लटकती हुई बालियों के कारण उसके गालों का रंग सफेद हो गया था जैसे उगते हुए चन्द्रमा की किरणों के कारण रात्रि का मुखड़ा। उसके माथे पर गोरोचन का एक छोटा सा तिलक था मानो यह तीसरी आंख हो। वह शिवाजी के अंग पर सजी पर्वतारोहिणी पार्वती सी लगती है।

यह श्री (लक्ष्मी) की तरह शोभायमान थी, जिसके वस्त्र नारायण की नील वर्ण छाया की शोभा से सुशोभित थे अथवा रति की भांति जिसे क्रोधी शिव द्वारा दहन किए गए कामदेव की आग से उत्पन्न होने वाले धुएं ने काला कर दिया था अथवा यमुना की तरह जो बलराम के हल से खींची जाने के डर से भागी जा रही थी। अथवा गहरी आंख से जिसने उसके कमल जैसे चरणों में से कोंपलें निकाल दी हों, ठीक वैसे ही जैसे दुर्गा रक्त चरण जिसने अभी महिषासुर का दलन किया हो।

उसकी उंगलियों की गहरी लाली के कारण उसके नाखून गुलाबी रंग के थे, चित्रित फर्श उसके कोमल स्पर्श के लिए अति कठोर था। वह आगे बढ़ी और उसने पांव जमीन पर ऐसे टेक दिए मानो दो कोमल टहनियां हों।

उसके पांव से निकलने वाली अग्नि वर्ण किरणें उसे ऐसे घेरे हुए थीं मानो वह अग्नि (देवता) के बाहुओं से घिरी हो, मानो उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर वह उसके जन्म दूषण को दूर कर ब्रह्मा के कृत को अकृत करना चाहता हो।

उसकी कमर ऐसी थी मानो प्रेम के हाथी के माथे पर तारों की पंक्ति जड़ी हो, उसकी माला बड़े-बड़े चमकदार मोतियों की एक लड़ी थी मानो गंगा की धारा को अभी-अभी यमुना ने रंगत दी हो।

शरत ऋतु की भांति उसने अपने कमल सदृश नयन खोले, वर्षा के बादलों जैसे उसके काले-काले बाल थे, मलय पर्वत की शृंखला की तरह वह चंदन से लिप्त थी, राशि चक्र की तरह वह मुक्ताजडि़त थी। सरस्वती की तरह उसके हाथ कमल की तरह सुंदर थे, अचैतन्य की तरह वह हृदय पर अधिकार करती थी, वन की तरह उसके पास जीवित सौंदर्य था, देव कन्या की तरह उस पर किसी का अधिकार न