154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
चांडाल कन्या का यह वर्णन पढ़ कर अनेक प्रश्न पैदा होते हैं पहले तो यही कि फाहियान के वर्णन से कितना भिन्न है? दूसरे बाण एक वात्स्यायन ब्राह्मण है। उससे द्वारा चांडाल बस्ती का ऐसा वर्णन कर चुकने के बाद चांडाल कन्या का ऐसा ऐश्वर्यशाली वर्णन करने में कुछ संकोच नहीं होता। क्या इस वर्णन का छुआछूत के साथ जुड़ी प्रचंड घृणा की भावना के साथ मेल बैठता है? यदि चांडाल अछूत थे तो एक अछूत कन्या राजा के महल में कैसे जा सकती थी? एक अछूत के लिए बाण इस प्रकार की भाषा कैसे उपयोग में ला सकता था? पतित होने की बात तो बहुत दूर है बाण के समय में चांडालों में शासक परिवार भी थे। बाण चांडाल कन्या को चांडाल राजकुमारी ख्1, कहता है। बाण ने कादंबरी 600 ई. के आसपास लिखी। इसका अर्थ हुआ कि 600 ई. तक चांडाल अछूत नहीं समझे जाते थे। इससे यह एकदम संभव प्रतीत होता है कि फाहियान ने जिस अवस्था का वर्णन किया है वह यद्यपि छुआछूत की सीमा को स्पर्श करती है किंतु वह अस्पृश्यता नहीं भी हो सकती। संभव है कि यह अपवित्रता को लेकर अति करने की बुरी आदत रही हो। यह बात और भी अधिक संभव प्रतीत होती है। यदि हम यह बात याद रखें कि जब फाहियान भारत आया उस समय यहां गुप्त राजाओं का राज्य था। गुप्त नरेश ब्राह्मणवाद के पोषक थे। यही वह समय है जब ब्राह्मणवाद का पुनरुद्धार हुआ और यह विजयी हुआ। एकदम संभव है कि फाहियान जिस चीज का वर्णन करता है वह अस्पृश्यता नहीं है किंतु वह एक सीमा है जहां तक ब्राह्मण इस संस्कारग्रस्त अपवित्रता को
खींच कर ले जाना चाहते थे। यह संस्कारग्रस्त अपवित्रता कुछ जातियों, विशेष रूप से चांडालों के साथ जुड़ गई थी।
दूसरा चीनी यात्री जो भारत आया उसका नाम ह्वेनसांग था। वह 629 ई. में भारत आया और भारत में सोलह वर्ष तक रहा तथा लोगों के रीति-रिवाजों और देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की गई अपनी यात्राओं का यथार्थ विवरण अपने पीछे छोड़ गया है। भारत के मकानों और शहरों की सामान्य अवस्था का वर्णन करते हुए वह कहता ख्2, हैःµ
‘‘ जिन शहरों और बस्तियों में वे रहते हैं उन शहरों, मकानों की चारदीवारी ऊंची, चौड़ी है किंतु सड़कें तंग और टेढ़ी-मेढ़ी हैं। दुकानें सड़कों पर हैं और सरायें सड़कों के किनारे-किनारे हैं। कसाई, धोबी, नट, नर्तक, वधिक और भंगियों की बस्ती एक निश्चित चिह्नों द्वारा पृथक की गई हैं। वे शहर से बाहर रहने के लिए मजबूर किए जाते हैं और जब कभी उन्हें किसी घर के पास से गुजरना होता है तो वे बायीं ओर
कादम्बरी (रीडिंग ट्रांसलेशन), पृ. 204
वाल्टर, हृ्वेनसांग, खण्ड I, पृ. 147