प्रस्तावना - Page 20

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है। लेकिन गेटे ने यह नहीं बताया है कि उस समय इतिहासकाल क्या करे जब कुछ कडि़यां टूटी हुई हों, जब महत्त्वपूर्ण घटनाओं से संबंधित प्रमाण उपलब्ध ही न हों। मुझे यह इसलिए कहना पड़ रहा है कि अछूतों की उत्पत्ति की खोज करने और तत्संबंधी समस्याओं के बारे में मुझे कुछ सूत्र नहीं मिले हैं। यह सत्य है कि ऐसा मैं ही अकेला व्यक्ति नहीं हूं जिसे इस समस्या से जूझना पड़ा है। प्राचीन भारत के सभी अध्येताओं के सामने यह कठिनाई आती है। भारतीय इतिहास के बारे में चर्चा करते हुए माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन का कहना हैःµ

फ्सिकंदर के आक्रमण से पूर्व भारतीय इतिहास की कोई तिथियां निश्चित नहीं हैं और इस्लामी विजय के पूर्व वास्तविक घटनाओं के बीच कोई सम्पर्क सूत्र नहीं है।य्

यह एक दुःखद बात है किंतु कोई चारा ही नहीं है। प्रश्न यह है कि इतिहास का विद्यार्थी क्या करे? क्या वह झक मार कर अपने हाथ खड़े कर दे और तब तक बैठा रहे जब तक खोए सूत्र खोज नहीं लिए जाते? मेरे विचार में नहीं। मैं सोचता हूं ऐसे मामलों में उसे अपनी कल्पनाशक्ति और अंतःदृष्टि से काम लेना चाहिए ताकि टूटे हुए सूत्र जुड़ सकें और कोई स्थानापन्न प्राकलन मान लेना चाहिए ताकि ज्ञात तथ्यों और टूटी कडि़यों को जोड़ा जा सके। मैं स्वीकार करता हूं कि हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाने के बजाए मैंने टूटे सूत्रों को जोड़ने के लिए यही मार्ग अपनाया है।

मेरी खोज का तिरस्कार करने के लिए आलोचक इस कमी का उपयोग करेंगे। यदि उनकी यह प्रतिक्रिया होगी तो मैं उन्हें चेताऊंगा कि यदि यही नियम है कि ऐतिहासिक निष्कर्ष निकालने के लिए इतिहास में वर्णित निष्कर्षों को ही मान्यता दी जा सकती है तो यह नियम गलत है यदि इन्हीं समस्याओं में उलझे रहना है।

  1. कौन-सी बात सीधे साक्ष्यों पर आधारित है। किसमें लेखक ने कल्पना-शक्ति

का उपयोग किया है।

  1. यदि कोई खोज संभव है तो क्या वह मेरी खोज से बेहतर है?

पहली स्थिति में मैं कहूंगा कि कोई शोध इसी कारण निराधार नहीं कही जाती कि उसका कुछ अंश अनुमान पर आधारित है। मेरे आलोचकों को यह ध्यान में रखना होगा कि हम ऐसी व्यवस्था की खोज में हैं कि जिसका प्राचीन स्रोत अनुपलब्ध है। अछूतों की उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयत्न ऐसा इतिहास लिखना नहीं है जिसका कलेवर निश्चित हो। यह एक ऐसा इतिहास फिर से लिखना है जिसकी विषयवस्तु नहीं है और यदि है भी तो उसका इस प्रश्न से सीधा संबंध नहीं है। इन हालात में हमें लक्ष्य तक पहुंचना है जो सामग्री लुप्त है या उससे यदि कुछ संकेत मिलते हैं तो चाहे शत-प्रतिशत सफलता न भी मिले फिर भी सत्य का अनुसंधान तो करना