1. गैर-हिन्दुओं में छुआछूत - Page 28

गैर-हिन्दुओं में छुआछूत 13

और शस्त्रों को मृत व्यक्ति की देह के साथ कब्र में गाड़ देने की प्रथा का यही तात्पर्य था कि लोग इन वस्तुओं के उपयोग को खतरनाक तथा दुर्भाग्यपूर्ण समझते थे।

वस्तुओं के स्पर्श से जो अपवित्रता पैदा होती थी उनकी चर्चा करें तो प्रारंभिक मनुष्य ने यह सीख लिया था कि कुछ वस्तुएं पवित्र हैं और कुछ अन्य अपवित्र। यदि कोई व्यक्ति किसी पवित्र वस्तु को छू दे तो यही माना जाता था कि उसने उसे अपवित्र कर दिया। पवित्र और सामान्य लौकिक वस्तुओं के दूसरे से पृथकीकरण का एक बहुत ही जीवंत उदाहरण फ्टोडाय् लोग हैं जिनके व्यापक रीति-रिवाजों तथा सामाजिक संगठनों का सारा आधार वे प्रयत्न ही हैं, जो वे अपने पवित्र पशुओं को, पवित्र मवेशी घरों को, पवित्र दूध को, पवित्र बर्तनों को और उन लोगों को जिनका काम कर्मकाण्ड करना है जो पवित्र बनाए रखने के लिए करते हैं। मवेशी खाने में जो पवित्र पात्र रहते हैं वे हमेशा पृथक कमरे में रखे जाते हैं और उन बर्तनों में दूध तभी भरा जा सकता है जब पहले वह दूसरे कमरे में रखे हुए एक बर्तन से दूसरे बर्तन में डाला जाए और इस प्रकार बिना इस नियत बर्तन में डाले उन बर्तनों में से दूध निकाला भी नहीं जा सकता। ग्वाला, जो पुजारी भी होता है एक लम्बे कर्मकाण्ड के बाद ही अपना काम आरंभ कर सकता है। इस प्रकार उसे सामान्य आदमी के दर्जे से ऊपर उठा हुआ समझा जाता है और वह उस फ्पवित्रय् कृत्य को करने के योग्य हो जाता है। उसको गांव में विशेष अवसरों पर ही सोने की आज्ञा होती है और ऐसे ही दूसरे नियम उसकी दिनचर्या रहती है। यदि वह फ्पवित्रय् ग्वाला किसी की मृतदेह संभालने चला जाए तो फिर वह अपने फ्पवित्रय् कृत्यों को करने के अयोग्य हो जाता है। इस सबसे अनुमान लगाया गया है कि इनमें से अधिकांश रीति-रिवाजों का एक ही उद्देश्य है कि लौकिकता के खतरों से रक्षा हो और फ्पवित्रय् वस्तु को लोगों के लिए उपभोग्य बनाये जाने योग्य रखा जाए। इसलिए उन लोगों से अलग रखा जाए जो स्वयं पवित्र नहीं होते।

इस पवित्रता की भावना का संबंध केवल वस्तुओं से नहीं था। लोगों के कुछ ऐसे विशिष्ट वर्ग भी थे जो फ्पवित्रय् समझे जाते थे। कोई व्यक्ति यदि उन्हें छू भी देता तो वह छूत लगा हुआ माना जाता था। पोलीनेशियन लोगों में एक अपने से ही व्यक्ति के स्पर्श से मुखिया की पवित्रता नष्ट हो जाती थी, यद्यपि ऐसा होना हीन व्यक्ति के लिए ही हानिकर था। दूसरी ओर फ्इफातेय् में जो पवित्र आदमी संस्कार संबंधी अपवित्रता से संबंध रखता था उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती थी। उगांडा में पूजा स्थल निर्माण से पहले आदमियों को चार दिन का समय केवल इसलिए दिया जाता था कि वे अपने आपको शुद्ध कर लें। दूसरी ओर मुखिया और उसकी चीजें प्रायः इतनी अधिक शुद्ध मानी जाती रही हैं कि यदि कोई हीन दर्जे का व्यक्ति उसे