14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
उपयोग में लाए तो वह उसके लिए खतरनाक होता है। फ्टोंगाय् द्वीप में जो आदमी किसी मुखिया को स्पर्श करे वह निषिद्ध हो जाएगा। यह दोष पवित्र मुखिया के पैर के तलवे को स्पर्श करने से दूर होगा। मलाया प्रायद्वीप के मुखिया की पवित्रता राजकीय चिन्ह में विराजती थी और यदि कोई उसका स्पर्श करे तो वह गंभीर सजा अथवा मृत्यु का भागी होता था।
अजनबी लोगों से मिलना, आदिम पुरुष द्वारा छुआछूत का स्रोत माना जाता था। बयोंगा के लोगों का विश्वास है कि जो लोग अपने देश से बाहर जाते हैं, उन पर बाहरी पैशाचिकता का प्रभाव हो सकता है। विदेशी वर्जित थे, क्योंकि विदेशी देवताओं की पूजा करने से उनके बुरे प्रभाव पड़ते थे। इसलिए उन्हें या तो धूनी दी जाती थी अथवा किसी दूसरे तरीके से शुद्ध किया जाता था। डीयरी और इसके पड़ोस की जातियों में स्वजातीय व्यक्ति भी जब बाहर से लौटते तो उनके साथ एक अजनबी सा बर्ताव होता था, और जब वह बैठ न जाए तब तक उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता था। अज्ञात देश से आने वालों के लिए जितना खतरा था, अपरिचित देश में जाना भी उतना ही खतरनाक था। आस्ट्रेलिया में जब एक जाति दूसरी जाति से संसर्ग में आती तो वे वायु शुद्धि के लिए जलती हुई मशालें आगे-आगे लेकर चलते थे, ठीक वैसे ही जैसे स्पार्टा देश के नरेश जब युद्ध के लिए जाते तो उनके आगे-आगे वेदी की पवित्र आग चलती थी।
इसी प्रकार जो बाहर से किसी घर में प्रवेश करते थे, उन्हें पांव के जूते उतारने जैसी ही, कोई न कोई रीति निभानी पड़ती थी, अन्यथा इस बात का पूरा डर था कि वे घर के लोगों को बाहर की छूत लगाकर अपवित्र कर देंगे, जब भी घर का कोई आदमी किसी को छू देने से अशुद्ध बना देने की स्थिति में हो तो बाह्य संसार से सम्पर्क के मुख्य साधन देहरी तथा चौखट पर खून लगा दिया जाता अथवा पानी छिड़क दिया जाता था। कभी-कभी घर के दरवाजे पर टोटके के रूप में घोड़े की नाल लटका दी जाती थी जिससे बुरे प्रभावों से रक्षा हो और घर में सौभाग्य आए।
इसमें संदेह नहीं कि जन्म, मृत्यु तथा विवाह के साथ जितने भी अनुष्ठान होते थे उन सब का एक मात्र यही तात्पर्य नहीं था कि वे जन्मादि प्रदूषण के स्रोत ही हैं, बल्कि जब और जहां-जहां भी एकांतवास होता है उससे इतना तो प्रदूषण होता है तथा वह और प्रदूषण का भी द्योतक है। जन्म, संस्कार, विवाह तथा मृत्यु होने पर उसके साथ किसी प्रकार का व्यवहार होने पर भी प्रदूषित होता है। वह त्याज्य है।
बालक का जन्म होने पर माता को पृथक कर दिया जाता है। वयसंधि पर और दीक्षित होने पर भी कुछ समय पृथक रहना पड़ता है। विवाह में मंगनी से लेकर विवाह संस्कार हो जाने तक पति-पत्नी एक दूसरे से पृथक रहते हैं।