गैर-हिन्दुओं में छुआछूत
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स्त्री जब रजस्वला होती है तो उसे पृथक रहना पड़ता है। मृत्यु होने पर पृथकीकरण विशेष रूप से होता है। मृतक व्यक्ति की देह ही नहीं उसके संबंधियों को भी अलग लोगों से दूर रहना पड़ता है। यह संगरोध उसके बढ़े हुए बालों और नाखूनों के और पुराने कपड़ों के पहनने से स्पष्ट होता है। इसका अर्थ यह होता है कि समाज के नाई, धोबी आदि उनकी सेवा नहीं कर रहे हैं। यदि शुद्ध व्यक्ति को किसी सामान्य लौकिक व्यक्ति ने दूषित कर दिया हो अथवा स्वजाति से ही अपवित्रता हुई हो तो एकांतवास होता ही है। सामान्य दूषित व्यक्ति को शुचि से दूर रहना ही चाहिए सजातीय को विजातियों से दूर रहना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि आदिमकाल के समाज में अशुद्धि के कारण पृथक कर दिया जाता था।
अशुद्धि को दूर करने के साधन पानी और रक्त हैं। जो आदमी अशुद्ध हो गया हो उस पर यदि पानी और रक्त की छींटे दे दिए जाते हैं तो वह पवित्र हो जाता है। पवित्र बनाने वाले अनुष्ठानों में वस्त्रों को बदलना, बालों तथा नाखूनों आदि को काटना, पसीना निकालना, आग तापना, धूनी देना, सुगंधित पदार्थों को जलाना और वृक्ष की किसी-किसी डाली से झाड़फूंक कराना शामिल हैं।
ये अशुद्धि मिटाने के साधन थे। किंतु आदिमकाल में अशुद्धि से बचने का एक और उपाय भी था। वह था एक की अशुद्धि दूसरे पर डाल देना। वह किसी दूसरे ऐसे व्यक्ति पर जो पहले से ही वर्जित अथवा बहिष्कृत होता था डाल दी जाती थी।
न्यूजीलैंड में यदि एक आदमी दूसरे के सिर को स्पर्श कर देता तो सिर, शरीर का पवित्र भाग होने के कारण वह आदमी वर्जित हो जाता था। तब अपने हाथों को एक प्रकार की जड़ विशेष से रगड़ कर अपने को पवित्र बनाना होता था। वह जड़ मातृ पक्ष में परिवार के मुखिया का भोजन बनती थी। टोंगा में यदि कोई आदमी वर्जित भोजन ग्रहण कर लेता तो उसके बुरे प्रभाव से निकलने का यही उपाय था कि वह अपने परिवार के मुखिया के पैर से पेट छुआ ले।
एक की अशुद्धि दूसरे में चले जाने की कल्पना बलि के पात्र की रीति से प्रकट होती है। फिजी में यदि कोई वर्जित आदमी एक सुअर पर अपने हाथ धो देता तो वह मुखिया के लिए पवित्र हो जाता। उगांडा में जब राजा के लिए शोक मनाने का समय समाप्त होता तो एक बलि के बच्चे के साथ एक गऊ, एक बकरी, एक कुत्ता, एक मुर्गी और राजा के घर की कुछ मिट्टी और आग नगर की सीमा पर पहुंचा दी जाती, वहां उन पशुओं को लंगड़ा-लूला बनाकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता। ऐसा विश्वास था कि इस रीति से राजा और रानी की सारी अशुद्धि दूर हो जाती है।
ये सब बातें आदिम समाज में अशुद्धि संबंधी कल्पना का अस्तित्व सिद्ध करती हैं।