हिन्दुओं में छुआछूत
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पर ही लागू होते हैं और जिनका पालन उसे करना चाहिए। यदि वह उसका पालन न करे तो वह अपवित्र होता ही है।
मनु की अशुचिता का सिद्धांत वास्तविक है काल्पनिक नहीं क्योंकि वह अशुद्ध व्यक्ति द्वारा दिए गए भोजन को अग्राह्य ठहराता है। मनु ने अशुचिता का समय भी निर्धारित किया है। यह भिन्न-भिन्न है। सपिण्ड हो तो दस दिन। बच्चों के लिए तीन दिन, सहपाठियों के लिए एक दिन, निश्चित दिन व्यतीत हो जाने मात्र से अशुचिता चली नहीं जाती। निश्चित अवधि पूरी हो जाने पर उस अवसर के योग्य प्रायश्चित करना पड़ता है।
शुद्धि के उद्देश्य से मनु ने इस विषय को तीन तरह से लिया हैःµ
शारीरिक अशुद्धि
मानसिक अथवा मनौवैज्ञानिक
नैतिक अशुद्धि
नैतिक अशुद्धि मन में बुरे संकल्पों को स्थान देने से पैदा होती है। उसकी शुद्धि के नियम तो केवल उपदेश या आदेश ही हैं ख्1, । किंतु मानसिक तथा शारीरिक अशुद्धि दूर करने के लिए जो अनुष्ठान हैं वे एक ही हैं, उनमें पानी ख्2,, मिट्टी ख्3,, गो-मूत्र ख्4,, कुशा ख्5,, और भस्म ख्6, का उपयोग शारीरिक अशुद्धि को दूर करने में होता है। मानसिक अशुद्धि को दूर करने में पानी सबसे अधिक उपयोगी है।
उसका उपयोग तीन तरह से होता है। आचमन, स्नान तथा सिंचन ख्1, । आगे चलकर मानसिक अशुद्धि दूर करने में पंचगव्य का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान हो गया। गौ से प्राप्त पांच पदार्थों-दूध, गोमूत्र, गोबर, दही और घी से इसका निर्माण होता है।
मनु ने यह व्यवस्था भी की है कि अपनी अशुचिता किसी दूसरे पर लगाकर उससे मुक्ति मिल जाए जैसे किसी गौ के स्पर्श द्वारा अथवा आचमन करके सूर्य की ओर देख लेने से।
व्यक्तिगत अशुचिता के साथ-साथ हिन्दुओं का प्रदेशगत और जातिगत अशुद्धि और उसकी शुद्धिकरण में भी विश्वास रहा है, ठीक वैसा ही जैसा प्राचीन रोम के निवासियों में प्रथा प्रचलित है। हर गांव की एक पशु जात्रा होती है। गांव की ओर से एक पशु अक्सर एक भैंसा खरीदा जाता है गांव की परिक्रमा के बाद पशु की बलि
अध्याय पांच- 105, 109, 127, 128
अध्याय पांच- 127
अध्याय पांच- 134, 136
अध्याय पांच- 121-124
अध्याय पांच- 115
अध्याय पांच- 111