7. छुआछूत की उत्पत्ति का आधर-नस्ल का अंतर - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

यह उन आदिम निवासियों का स्वागत करने के लिए सदा तैयार रहा है, जो इनका विधान मानने के लिए तैयार हुए चाहे उन्हें एक बहुत ही निम्न स्थान दिया गया हो, दूर-दूर रखा गया हो और मंदिरों के द्वार उनके लिए बंद रखे गए हों। इसलिए ऐसा लगेगा कि नृवंश शास्त्र के तर्क निर्णायक नहीं माने जा सकते, जबकि हम इन बातों पर विचार करते हैं जिनका उनके मूल प्रजातीय स्वभाव पर प्रभाव पड़ा होगा और जिन्होंने उनके दृष्टिकोण को बदल दिया होगा। इस प्रकार द्रविड़ों ने पैरियान लोगों के साथ वही व्यवहार किया जो आर्यों ने पराजितों के साथ किया। समझा जाता है उन्होंने उन्हें दास का दर्जा दिया और उन्हें वे काम सौंपे जिनका स्वयं करना वे हेय समझते थे। केवल विवाह ही एक विचारणीय बात नहीं पैरियन लोगों पर लगे प्रतिबंधों का कारण एक बड़ी हद तक निषेध के छद्म गुण भी हैं। किसी ऐसे आदमी को कुल देव की समानता या अपने कुल देवों में शामिल करना सामाजिक मर्यादा के ही विरुद्ध नहीं, इससे उस परिवार पर उसके अपने देवता विशेष का भी कोप हो सकता है और यदि कहीं इसे मंदिर की पवित्र सीमाओं के भीतर देवता की पूजा करने दिया गया, तब तो शायद प्रलय ही हो जाए। हां यद्यपि वे पूजा में भाग नहीं ले सकते किंतु वे ऐसे तुच्छ काम कर सकते हैं जिनसे पवित्र स्थानों के अपवित्र होने की आशंका न हो। ईसाई धर्म की भाषा में कहा जाए तो कहना होगा कि यद्यपि एक पैरिया वेदी पर नहीं चढ़ सकता था, पूजा नहीं कर सकता था तो भी वह एक शर्त पर गिरजों की घंटी बजा सकता था। वह अपने आपको प्रार्थना सभा में शामिल नहीं समझ सकता था, वह यथार्थ में सभा के बाहर था। इस अवस्था में वह संस्कार से अपवित्र था। उसका यह धब्बा न पानी से धुल सकता था, न किसी प्रायश्चित से ही जो निषेधों के कारण उस पर लगा हुआ था। उसका स्पर्श करना और उसे दूर-दूर रखने के अतिरिक्त उससे किसी प्रकार का संबंध रखना, मानो एक प्रकार से उड़कर छूत लग जाना है। आप उससे अपना खेत जुतवा सकते हैं, क्योंकि उसमें आज्ञा देने के अतिरिक्त आपको उससे कोई सरोकार नहीं रखना पड़ता। उसके सिर पर अपवित्रता का ठप्पा लगा है और यह वैसा ही उसके साथ पैदा हुआ है, जैसे उसकी नाडि़यों का रक्त। इस प्रकार भारतीय समाज ने उसे अपवित्र और पतित तो माना ही था। वह उन पेशों के कारण जो उसके लिए नियत हैं और भी अधिक पतित तथा घिनौना हो गया।

श्री राइस के इस मत के वास्तव में दो भाग हैं। उनके मत के अनुसार अस्पृश्यता दो बातों से उत्पन्न हुई हैµ नस्ल और पेशा। यह स्पष्ट ही है कि इन दोनों बातों पर पृथक-पृथक विचार करना होगा। इस अध्याय में हम नस्ल के अंतर को छुआछूत की उत्पत्ति का कारण होने के संबंध में विचार करेंगे।

श्री राइस के नस्ल के सिद्धांत में दो पहलू हैंःµ

(1) अछूत अनार्य हैं, अद्रविड़ हैं, मूल वासी हैं, और

(2) वे द्रविड़ों द्वारा पराजित हुए और अधीन बनाए गए।