छुआछूत की उत्पत्ति का आधारµनस्ल का अंतर
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इस मत पर विचार करते समय भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण, उनकी विजय और उससे उत्पन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएं, इन सभी पहलुओं पर भी विचार करना होगा। श्री राइस के मतानुसार भारत पर दो आक्रमण हुए हैं। पहला आक्रमण द्रविड़ों का है। उन्होंने अद्रविड़ मूल निवासियों पर विजय की जो वर्तमान अछूतों के पूर्वज थे और उन्हें अछूत बनाया। दूसरा आक्रमण भारत पर आर्यों का आक्रमण है। आर्यों ने द्रविड़ों को जीता। वह यह नहीं बताते कि विजयी आर्यों ने विजित द्रविड़ों के साथ कैसा व्यवहार किया। यदि उन्हें उत्तर देने के लिए मजबूर किया जाए, तो शायद वे कहें कि आर्यों ने उन्हें शूद्र बना दिया। यह तो एक बनी बनाई शृंखला हाथ लग गई। द्रविड़ों ने आक्रमण किया और मूलवासियों को अछूत बनाया यह कथा इतनी अधिक अपरिपक्व है कि इससे शूद्रों और अछूतों की उत्पत्ति के संबंध में उलझे अनगिनत प्रश्न उलझे ही रह जाते हैं, उनका और समाधान नहीं हो सकता।
प्राचीन इतिहास के विद्यार्थी जब अतीत की मीमांसा करते हैं तो उन्हें चार नाम प्रायः मिलते हैं, आर्य, द्रविड़, दास और नाग। इन नामों का क्या अर्थ है? इस प्रश्न पर कभी विचार नहीं किया गया। क्या ये आर्य, द्रविड़, दास और नाग चार विभिन्न प्रजातियों के चार नाम हैं अथवा एक ही प्रजाति के भिन्न-भिन्न नाम हैं। सामान्य मान्यता है कि ये चार भिन्न नस्लें हैं। यह एक ऐसी मान्यता है जो श्री राइस के मत का आधार है। यह मत हिंदू समाज की रचना, विशेष रूप से इसकी वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करने का प्रयत्न है। इस प्रकार के मत को स्वीकार करने से पहले आधार की परीक्षा कर लेनी होगी।
हम आर्यों से प्रारंभ करेंगे। यह निर्विवाद है कि वे एक ही जाति के लोग नहीं थे। वे दो हिस्सों ख्1, में विभक्त थे, यह निर्विवाद है। यह भी निर्विवाद है कि दोनों की संस्कृतियां भिन्न थीं। दोनों में से एक को हम ऋग्वेदीय आर्य कह सकते हैं, और दूसरे को अथर्ववेदी आर्य। इनके बीच की सांस्कृतिक खाई पूरी-पूरी प्रतीत होती है। ऋग्वेदी आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे, अथर्ववेदी आर्य जादू टोनों में। उनकी पुराण कथाएं भिन्न-भिन्न थीं। ऋग्वेदी आर्य प्रलय और मनु से सृष्टि की उत्पत्ति में विश्वास करते थे। अथर्ववेदी आर्य फ्पतनय् में विश्वास नहीं करते थे। वे मानते थे कि उनकी नस्ल ब्रह्मा या प्रजापति से उत्पन्न हुई। उनके साहित्यिक विकास के भी भिन्न-भिन्न रास्ते थे। ऋग्वेदी आर्यों ने ब्राह्मण सूत्र तथा आरण्यकों की रचना की। अथर्ववेदियों ने उपनिषदों की रचना की। यह वैचारिक संघर्ष इतना बड़ा था कि ऋग्वेदी आर्यों ने
- इस विषय के गहन अध्ययन के लिए मेरी पुस्तक फ्हू वर द शूद्राजय् का अवलोकन करें।