7. छुआछूत की उत्पत्ति का आधर-नस्ल का अंतर - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

चिरकाल तक अथर्ववेद को पवित्र वाघ्मय नहीं माना और न ही उपनिषदों को। जब उन्होंने उपनिषदों को स्वीकार भी किया तो उसे वेदान्त कहा। आजकल वेदांत शब्द का अर्थ वेद का सार लिया जाने लगा है। किंतु इसका प्राचीन अर्थ रहा है वेद के अंत में वेद की सीमा के बाहर वेद के सदृश पवित्र नहीं। वे इसके अध्ययन को प्रतिकूल अध्ययन मानते थे। हम नहीं जानते कि आर्यों के ये विभाग दो भिन्न-भिन्न नस्लें थीं या नहीं। हम यह भी नहीं जानते हैं कि क्या आर्य किसी प्रजाति या नस्ल का ही नाम रहा हो, इसलिए इतिहासकार जो यह मानकर चले हैं कि आर्य एक भिन्न प्रजाति थे, यह उनकी गलती है।

इससे भी बड़ी गलती दासों को नागों से पृथक करना है। दास और नाग एक ही हैं। दास, नागों का केवल दूसरा नाम मात्र है। यह समझना कठिन नहीं है कि वैदिक वाघ्मय में नागों का ही नाम दास क्यों पड़ा। दास भारतीय ईरानी शब्द दाहक का संस्कृत तत्सम रूप है। नागों के राजा का नाम दाहक था इसलिए आर्यों ने नागों के राजा के नाम पर सभी नागों को सामान्य रूप से दास कहना आरम्भ किया ख्1,

नाग कौन थे? निस्संदेह वे अनार्य थे। वैदिक वाघ्मय को ध्यान से देखने से ख्2, उसमें एक विसंगति और द्वेत की भावना दो तरह की संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच उहापोह की भावना साफ तौर पर दिखाई देती है। ऋग्वेद में हमारा परिचय आर्य देवता इन्द्र के शत्रु अहि वृत्र (सांप देवता) से होता है। पीछे चलकर यह सांप देवता नाग नाम से प्रसिद्ध हुआ, किंतु आरंभिक वैदिक वाघ्मय में नाग और नाम दृष्टिगोचर नहीं होता और जब यह शतपथ ब्राह्मण (11-2,7,12) में प्रथम बार आता है, तो यह स्पष्ट नहीं होता कि नाग का मतलब एक बड़ा सांप है या बड़ा हाथी। लेकिन इससे अहिवृत्र का स्वरूप नहीं छिपता क्योकि ऋग्वेद में उसका स्वरूप सदैव पानी में अथवा उसके चारों ओर छिपे तथा आकाश और पृथ्वी के जल पर समान रूप से अधिकार किए हुए सांप का है।

अहिवृत्र संबंधी वेद मंत्रों से यह भी स्पष्ट है कि आर्य उसकी पूजा नहीं करते थे। वे उसे आसुरी प्रकृति का एक शक्तिशाली देवता मानते थे, जिसे परास्त करना ही इष्ट था।

ऋग्वेद में नागों का नाम आने से यह स्पष्ट है कि नाग एक बहुत ही प्राचीन पुरुष थे। यह भी स्मरणीय है कि नाग न तो आदिवासी ही थे और न असभ्य ही।

  1. इस विषय पर मेरी रचना ‘शूद्र कौन थे’ पढ़ें।

  2. अगले पृष्ठों में यह स्पष्ट है कि फ्नाग और नाग्स कल्ट इन एंसीएंट इंडियन हिस्ट्रीय् के लेखक कु. करुणाकरण गुप्त देखें उनका प्रबंध भारतीय इतिहास कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन में पढ़ा गया पृष्ठ 214 से आगे, 1939