7. छुआछूत की उत्पत्ति का आधर-नस्ल का अंतर - Page 76

छुआछूत की उत्पत्ति का आधारµनस्ल का अंतर

61

समुद्रगुप्त की सेनाओं ने परास्त कर दिया था, जो कि स्कन्दगुप्त के समय तक हमें एक सर्वनाग अंतर्वेदों ख्1, का क्षात्रप ज्ञात होता है। आस-पास विशेष रूप से भरूकच्छ में छठी शताब्दी तक नागों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। जूनागढ़ शिलालेख से यह पता लगता है कि स्कन्दगुप्त ने नागों के एक विद्रोह ख्2, को बुरी तरह दबाया था। 570 ई. में दट्टाप्रथम गुर्जन ने नागों ख्3, को उखाड़ फेंका। उन्हें त्रिहुल्लक या भरूच ख्4, के द्वारा शासित बनवास माना गया है। ध्रुवसेन द्वितीय के 645 ई. के दानपत्र में प्रभात श्री नाग ख्5, का दत्तक के नाम से उल्लेख है।

नवीं शताब्दी में नागों ने विशेष रूप से मध्यभारत में दूसरी बार फिर अपना प्रभुत्व जमाया। 800 ई. में कोशल स्थित श्रीपुर को महाराजा तीव्रदेव ने नाग के कबीले ख्6, को हराया। इसके कुछ समय बाद बंगाल के शिलालेखों में भी नागों के दो उल्लेख मिलते हैं। महामांडलिक ईश्वर घोष के राजगंज के एक लेख से एक घोष नाग परिवार से हमारा परिचय होता है इसे ग्यारहवीं शताब्दी ख्7, में माना गया है। बारहवीं शताब्दी ख्8, के हरिवर्मादेव के मंत्री भट्ट भवदेव की भुवनेश्वर प्रशस्ति में भी उनके द्व ारा नाग राजाओं के विनाश का उल्लेख है। रामचरित मानस में भी रामपाल द्वारा भाव भूषण सन्तति में उत्कल राज्य की विजय का उल्लेख किया गया है। लेकिन यहां यह स्पष्ट नहीं है कि वे नाग थे या चंद्र थे। अधिक संभावना यही है कि वे नाग ही थे, क्योंकि वे ही अधिक प्रसिद्ध थे।

दसवीं से बारहवीं शताब्दी में एक सैन्द्रक सिंद अथवा छिन्दक परिवार की अलग-अलग शाखाएं शनैः-शनैः मध्य भारत विशेष रूप से बस्तर के विभिन्न प्रदेशों में फैल गइंर्। ये अपने को भोगवती और नागवंशी कहते थे। दसवीं शताब्दी के शिलालेख में बेगुर के नागोत्तरों का वर्णन है। वे पश्चिम गंग के राजा एरियप्प की ओर से वीर महेन्द्र के विरुद्ध लड़े और युद्ध में यश प्राप्त किया। यदि फ्भवसाहसांक-चरितय् को प्रमाण माना जाए तो सिंधुराज परमार की रानी का पिता नाग नरेश इसी समय के आस-पास नर्मदा के तट पर रत्नावती में राज्य करता रहा होगा।

द्रविड़ कौन हैं? क्या वे लोगों से भिन्न हैं अथवा क्या एक ही नस्ल के लोगों के

  1. जी. आई., पृष्ठ 68

  2. वही, पृष्ठ 59

  3. आई. ए. 8, पृष्ठ 82

  4. बी. गंज 11, 115

  5. ई 11, पृष्ठ 92

  6. जी. आई., पृष्ठ 298

  7. भण्डारकर, सूची सं. 2100

  8. इंस्क्रिप्शन ऑफ बंगाल, पृष्ठ 30