छुआछूत की उत्पत्ति का आधारµनस्ल का अंतर
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हम देख चुके हैं, अत्यंत प्राचीन काल में नागों का अधिकार था। मुस्लिम-आक्रमण की उथल-पुथल से चेरू अपनी भूमि से अधिकार च्युत हो गये प्रतीत होते हैं। अब ये एकदम निर्धन हैं और प्रायः उनके पास भूमि सम्पत्ति नहीं हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं हो सकता कि ये लोग अपने द्रविड़ बंधु चेरों के संबंधी हैं।
चेरुओं में कई विशिष्ट रीतियां हैं। उनमें एक ऐसी है जिससे लिच्छवियों और नेपाल के नेवारों से उनका संबंध जुड़ता लगता है। यह है प्रत्येक पांच या छह घरों पर फ्राजाय् का चुना जाना, और फ्तिलकों ख्1, य् आदि से उनका राज्याभिषेक करना। लिच्छवियों तथा नेवारियोंµदोनों में ही बहुत सी ऐसी परम्पराएं हैं जिनका दक्षिण के द्रविड़ों से साम्य है। सभी सूर्य की पूजा करते हैं। नेपाल में करकार्टक नाग का वही स्थान है जो नील नाग का कश्मीर में। लिच्छवियों की राजधानी वैशाली का रक्षक देवता नाग था। लिच्छवियों और नेवारों के विवाह संबंध तमिल लोगों के अत्यधिक सदृश हैं, और उनके समान उत्पत्ति की बात पर बहुत प्रकाश पड़ता है।
फ्नेवारों में जायदाद पर मातृ सत्तात्मक व्यवस्था के अनुसार अधिकार होता रहा है। जैसा कि कभी पंजाब के अरट्ट, बाहिक और तखास लोगों में था। उनमें उनका अपना पुत्र उत्तराधिकारी ख्2, न होकर उनका भांजा उत्तराधिकारी होता था। अभी तक यह एक द्रविड़ रिवाज है। थोड़े में कहना हो तो इसी युग के एक द्रविड़ लेखक श्री बालकृष्ण नैय्यर का कहना है कि उन्हें ‘‘उनके आदमी लगभग हर खास बात में नेवारियों ख्3, के सगे संबंधी लगते हैं।य्
इनके अतिरिक्त दूसरी कडि़यां भी हैं जो दक्षिण के नागों को उत्तर भारत के लोगों के साथ मिलाती हैं। चम्बल नदी के समीप कंसवाह में कर्नल टाड को मिले एक शिलालेख के अनुसार शैलेन्द्र नाम का एक राजा तक्ष ख्4, राज्य करता था, जो ‘सरय’ जनजाति का था। यह जनजाति वीरों के रूप में प्रसिद्ध थी। यह स्पष्ट ही है कि वह तक्ष या तखा पंजाब का वही राज्य था, जहां ह्वेनसांग ख्5, आया था और जिसका पहले उल्लेख हो चुका है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि तखा के फ्नागय् लोग फ्सरयय् भी कहलाते थे।
फिर शिवालिक में, सतलज और ब्यास घाटी के बीच सर या स्योरज नाम का एक प्रदेश है। इसमें नाग देवताओं की ही विशेष पूजा होती है।
शेरिंग रेसेल NW, पृ. 376-77
महाभारत का मा, पृ. XIIX
कलकत्ता रिव्यू, 1896
एनल्स ऑफ राजस्थान
ह्वेनसांग वील I, 165