64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
ऊपरी चिनाब घाटी में एक दूसरा फ्स्योरजय् है। वहां भी नाग पूजक लोग ही रहते हैं।
फ्सरजय् अथवा फ्स्योरजय् कर्नल टाड के शिलालेख का फ्सरयय् ही प्रतीत होता है। गंगा घाटी के चेरू लोगों का दूसरा नाम फ्श्योरिय् भी यही है। चेर अथवा नाग लोगों का पुराना तमिल नाम फ्सरेय् भी यही लगता है। इसलिए यह स्पष्ट सा ही है कि फ्सरयय् या तख्य सतलुज घाटी के फ्सरजय् गंगा के स्योरि अथवा चेरू और दक्षिण के चेर, सेर या केरल सभी नागपूजकों की ही भिन्न-भिन्न शाखाएं हैं।
इस बात की ओर भी ध्यान दिया जा सकता है कि हिमालय की कुछ बोलियों में फ्कीराय् या फ्कीरीय् का अर्थ सांप है। कदाचित इसी शब्द से फ्किरातय् शब्द बना हो। ‘राजतरंगिणी’ में हिमालय के लोगों के लिए आया है। बाराहमिहिर ने भी फ्किरोय् का उल्लेख किया है। प्रो. कीलहार्न * द्वारा प्रकाशित एक ताम्रपत्र में भी इसका उल्लेख है।
कांगड़ा घाटी में बैजनाथ मंदिर है। वहां के एक शिलालेख में उस स्थान ** का नाम किरग्राम है। स्थानीय बोली में इसका अर्थ होगा सांपों का गांव। नाग अभी बैजनाथ का और आस-पास के सारे प्रदेश का जनप्रिय देवता है, और इस प्रकार कीरा (क्रीड़ा) शब्द नाग का पर्यायवाची है और इसमें कुछ संदेह नहीं रह जाता कि हिमालय के सर्प पूजक कीरा दक्षिण के द्रविड़ केर, चेर अथवा केरल के संबंधी थे।
नाम की समानता सदैव विश्वसनीय नहीं होती, किंतु यहां हमारे पास कुछ और भी तथ्य हैं। ये लोग जिनके नाम स्पष्टतः एक ही हैं, सभी सूर्यवंशी हैं। ये सभी मनियर-नाग को मानते हैं और सभी नाग देवताओं को अपने पूर्वज मानकर पूजा करते हैं।
उपर्युक्त कथन से यह लगभग निश्चित है कि दक्षिण के द्रविड़ उसी परम्परा के हैं, जिस परंपरा के उत्तर के नाग और असुर।
इससे यह स्पष्ट है कि नाग और द्रविड़ एक ही जाति हैं। इतने प्रमाण होने पर भी संभव है लोग इस मत को स्वीकार न करें। इस मत को स्वीकार करने में जो सबसे बड़ी कठिनाई है वह दक्षिण के लोगों के द्रविड़ नाम की है। उनके लिए यह पूछना स्वाभाविक होगा कि यदि दक्षिण के लोग नाग ही हैं तो केवल वे ही द्रविड़ क्यों कहलाते हैं। आलोचक अवश्य पूछेंगे। यदि द्रविड़ और नाग एक ही लोग हैं तो दक्षिण के लोगों के लिए भी नाग शब्द का ही प्रयोग क्यों नहीं हुआ। इसमें कोई
*** राजतरंगिणी स्टीन SRAS जनवरी 1903, पृ. 37 VIII 27,67 रेपसन SRAS जुलाई 1900, 533