छुआछूत की उत्पत्ति का आधारµनस्ल का अंतर
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संदेह नहीं कि यह एक उलझन है। किंतु यह कोई ऐसी गुत्थी नहीं है जो सुलझाई न जा सके। यह सुलझ सकती है, बशर्ते कि कुछ बातों को ध्यान में रखा जाए।
पहली बात जो ध्यान देने की है, वह भाषा संबंधी स्थिति है। आज दक्षिण की भाषा उत्तर की भाषा से भिन्न है। क्या वह सदैव से है। इस प्रश्न पर श्री ओल्डहम ख्1, के विचार ध्यान देने योग्य हैंः
‘‘यह स्पष्ट है कि प्राचीन संस्कृत व्याकरण में द्रविड़ प्रदेशों की भाषा को उत्तर की बोलियों से संबंधित माना जाता था और इसका उन लोगों की भाषा से विशेष संबंध था जो फ्असुरोंय् के वंशज प्रतीत होते हैं।’’ इस प्रकार सहस्त्रचन्द्रिका में लक्ष्मीधर का कथन है कि पाण्ड्य, केकय, बाहलीक, अहलीक, सहृय और नेपाल पैशाची देशों में पैशाची भाषा बोली जाती है। कुन्तल, सुदेश, भोट, गांधार, हैव और कनोजन ये पैशाची देश हैं। सब बोलियों में पैशाची में संस्कृत का सबसे कम अंश है।
फ्असुर आरम्भ में आर्यों से भिन्न कोई भाषा बोलते थे, यह स्पष्ट है। प्रो. म्यूर ने ऋग्वेद से बहुत से अनुच्छेद उद्धृत किए हैं जिनमें असुरों की भाषा के लिए फ्मृद्वाधय् शब्द का प्रयोग किया गया है। फ्मृद्वाधय् जिसका मेरा अर्थ फ्हानि प्राप्त बोलीय् है, सायण के अनुसार उन लोगों की बोली है, जिसकी जिह्वा नष्ट हो गई है। ख्2, इसमें संदेह नहीं कि इस शब्द का मूल अर्थ यही रहा है कि असुरों की भाषा आर्यों को कमोबेश समझ में ही नहीं आती हो। ऋग्वेद के एक दूसरे अनुच्छेद से भी यही व्याख्या ठीक उतरती है, जिसमें कहा गया है कि इन्द्र को प्रसन्न कर अपशब्द बोलने वालों पर जीत हो।’’ ख्3,
‘शतपथ ब्राह्मण’ में लिखा है असुरों के वाणी न होने से वे कहीं के नहीं थे। वे फ्हेलवः हेलवःय् चिल्लाते थे। उनकी वाणी ऐसी ही अगम्य थी और जो इस प्रकार बोलता है वह म्लेच्छ है। इसलिए कोई ब्राह्मण बर्बर-भाषा न बोले, क्योंकि यह असुरों ख्4, की भाषा है।
मनु ने लिखा है ‘‘जो ब्राह्मण के मुंह, बांह और जांघ और पैरों से उत्पन्न वर्णों से बाहर के हैं, चाहे वे म्लेच्छ भाषा बोलें, चाहे आर्य भाषा वे दस्यु हैं।य् ख्5, इससे स्पष्ट है कि मनु के संयम में आर्य भाषा के साथ-साथ म्लेच्छ अथवा असुरों की भाषा भी बोली जाती थी। तो भी ‘महाभारत’ में जिस समय का उल्लेख किया गया
सन एण्ड सर्वेंट
म्यूर OST 1149
ऋग्वेद विल्सन VII, XVIII 13
शतपथ ब्राह्मण 2, 1, 23
म्योर हगरन X 45