7. छुआछूत की उत्पत्ति का आधर-नस्ल का अंतर - Page 81

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

है, आर्य जातियों में असुर भाषा लगभग लुप्त हो गई। विदुर ने जब युधिष्ठिर को संबोधित करके कहा तो म्लेच्छ भाषा का प्रयोग किया जिससे युधिष्ठर ख्1, के अतिरिक्त कोई समझ न सके।

इसके बाद के समय में राम तर्क बागीश वैयाकरण ने फ्नाग-भाषाएं ख्2, बोलने वालों का उल्लेख किया है। इससे अनुमान होता है कि मूल असुरों ने अपने बदल गए भाइयों को बहुत बाद तक अपने धर्म और अपनी परम्परागत रीति-रिवाजों की रक्षा की। इन्हीं मूल जातियों में ही, पैशाची बोलियों का उपयोग होता था और जैसा हम अभी देख चुके हैं, इन्हीं जातियों में द्रविड़ पांड्य ख्3, थे।य्

तमिल और दूसरी सम्बद्ध बोलियों का आधार प्राचीन असुर भाषा ही है। इस मत का समर्थन इस बात से भी होता है कि सिंध की सीमा पर रहने वाली बाहुई नाम की एक जाति की भाषा उनकी भाषा के बहुत समीप प्रमाणित हुई है। वास्तव में डा. काल्डवैल का कहना हैµ फ्ब्राहुई (भाषा) के कारण हम द्रविड़ प्रजाति के चिह्नों को सिंधु पार मध्य एशिया के दक्षिण तक खोज सकते हैं।य् यह प्रदेश जैसा कि मैं पहले उल्लेख कर चुका हूं, असुरों अथवा नागों का निवास रहा होगा जिनकी नस्ल द्रविड़ राज्यों के संस्थापक से बहुत कुछ मिलती होगी।

जो भी प्रमाण एकत्र किए हैं, उन पर विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि दक्षिण के द्रविड़ और उत्तर के असुर अथवा नाग एक ही परम्परा के लोग हैं।

दूसरी बात जो ध्यान देने की है, वह यह है कि द्रविड़ मौलिक शब्द नहीं है। यह तमिल शब्द का संस्कृत रूप है। मूल शब्द तमिल जब संस्कृत में आया तो वह दमिल्ल ख्4, हो गया और दमिल्ल ही द्रविड़ बन गया। द्रविड़ की व्युत्पत्ति भाषा के नाम से उसकी नस्ल का बोध नहीं होता।

तीसरी बात जो याद रखने की है कि तमिल या द्रविड़ केवल दक्षिण भारत की भाषा नहीं थी किंतु आर्यों के आगमन के पूर्व समस्त भारत ख्5, की भाषा थी और कश्मीर के रामेश्वरम् तक बोली जाती थी। इससे अगली बात जो ध्यान देने की है आर्यों और नागों का संबंध और नागों तथा उनकी भाषा पर इसका जो प्रभाव पड़ा, वह है। यह विचित्र बात लगेगी किंतु इस संबंध का उत्तर के नागों पर जो प्रभाव पड़ा वह उस प्रभाव से बिल्कुल भिन्न है जो दक्षिण भारत के नागों पर पड़ा। उत्तर

  1. महाभारत आदि पर्व जर गृह, पृ. VX/VII

  2. म्यूर OST II, 52

  3. वही, 49

  4. लेखक का व्याख्यान, भारत का प्राचीन इतिहास (1919), पृ. 80

  5. वही, पृ. 25-28