7. छुआछूत की उत्पत्ति का आधर-नस्ल का अंतर - Page 85

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

विद्यमान है। प्रत्येक कबीला टोलियों में बंटा हुआ था, और टोलियां परिवारों के समूहों में बंटी हुई थीं। हर परिवार समूह का अपना एक कबीला चिन्ह होता था। चाहे कोई जानदार वस्तु हो चाहे बेजान। जिनका परस्पर एक ही टोटम होता था, वह विजातीय विवाह करने वालों के समूह के रूप में संगठित हो जाते थे जिन्हें हम गोत्र या कुल कहते हैं। सगोत्र परिवारों के विवाह संबंध वर्जित थे। क्योंकि यह माना जाता था कि वे एक ही पूर्वज के वंशज हैं और उनकी नसों में एक ही रक्त दौड़ रहा है। इस बात का ध्यान रखकर यदि भिन्न-भिन्न कबीलों और जातियों के इष्ट देव प्रतीकों का अध्ययन किया जाए तो वह नस्ल के निर्णय करने में नासिका माप निरापद कसौटी का काम दे सकता है।

दुर्भाग्य से भिन्न-भिन्न जातियों के विविध टोटमों पर समाज शास्त्र के विद्यार्थियों ने एकदम ध्यान नहीं दिया। यह धारणा है कि इस बात का मुख्य कारण जनगणना आयोगों की लापरवाही है। हिंदू सामाजिक पद्धति की वास्तविक इकाई और हिंदू समाज का मूलाधार उपजाति है। इसका नियम है कि उस उपजाति से बाहर किसी से विवाह न किया जाए। इससे बढ़कर गलती नहीं हो सकती। हिंदू समाज इकाई उपजाति नहीं है किंतु सजातीय विवाह प्रथा के नियम के आधार पर बना हुआ परिवार है। इस अर्थ में हिंदू समाज एक कबायली समाज है वह उपजाति पर आधारित समाज नहीं। हिंदू परिवार में विवाह के अवसर पर कुल और गोत्र के विचार को ही प्रधान महत्व दिया जाता है। जाति और उपजाति का विचार गौण है। हिंदू समाज के कुल और गोत्र का वही दर्जा है जो आदिम समाज में कबायली प्रतीकों (टोटमों) का था। इससे प्रकट होता है कि हिंदू समाज अपने संगठन की दृष्टि से अभी भी कबीला ही है। परिवार उसका आधार है। उसे सजातीय विवाह प्रथा के नियम को लागू करना होता है तो इससे कबीलों के कुल और गोत्र पर आधारित विजातीय विवाह निषेध नियम का पालन करना होता है।

इस बात को स्वीकार करना कि उपजाति की अपेक्षा पारिवारिक महत्व स्थापित होता है महत्वपूर्ण है। इससे हिंदू परिवारों में प्रचलित कुल और गोत्रों के नामों का अध्ययन आवश्यक है। इस प्रकार के अध्ययन से भारत के लोगों की नस्ल के निर्धारण के अध्ययन में बड़ी सहायता मिलेगी। यदि भिन्न-भिन्न जातियों के एक ही कुल और गोत्र हैं तो कहना संभव होगा कि यद्यपि सामाजिक दृष्टि से ये जातियां भिन्न-भिन्न हैं किंतु नस्ल की दृष्टि से एक ही हैं। इस प्रकार के दो अध्ययन हुए हैं। एक महाराष्ट्र में श्री रिसले ख्1, द्वारा और दूसरा पंजाब ख्2, में रोज द्वारा। दोनों अध्ययनों का जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ है उससे इस सिद्धांत का एकदम खंडन हो जाता है कि अछूत

  1. भारत की जनगणना जातीय परिशिष्ट

  2. ग्लोसरी ऑफ ट्राइब्स एंड कास्टम इन पंजाब - रोज, खंड III] पृ. 9.76