अध्याय 8
छुआछूत की व्यवसायजन्य उत्पत्ति
अब हम छुआछूत की व्यवसायजन्य उत्पत्ति के मूल सिद्धांत पर चर्चा करेंगे। श्री राइस के अनुसार छुआछूत का आधार गंदे और घृणित पेशा पाया जाता है। यह मत कुछ युक्तिसंगत जंचता है लेकिन इससे छुआछूत की उत्पत्ति की सच्ची व्याख्या स्वीकार करने में कुछ कठिनाइयां हैं। अछूत जिन गंदे और घृणित पेशों को करते हैं वे सभी मानव समाजों में समान हैं। हर समाज में ऐसे लोग हैं जो इन पेशों को करते हैं। संसार के दूसरे देशों में ऐसे लोगों के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार क्यों नहीं हुआ? दूसरा प्रश्न है कि क्या द्रविड़ लोगों को इन पेशों से अथवा इन पेशों को करने वालों से घृणा थी? इस विषय में हमारे पास किसी प्रकार का कोई साक्ष्य नहीं है। लेकिन आर्यों के बारे में हमारे पास साक्ष्य हैं। इस साक्ष्य से यही प्रमाणित होता है कि आर्य भी दूसरे लोगों की तरह के थे और उनको पवित्रता तथा अपवित्रता की कल्पना दूसरे प्राचीन लोगों से भिन्न न थी। नारद स्मृति के इस उद्धरण पर विचार करने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि आर्यों को गंदे पेशे करने में किसी प्रकार का कोई एतराज न था। पांचवें अध्याय में नारद ने सेवा धर्म के उल्लंघन का विचार किया है। उस परिच्छेद में ये श्लोक आए हैंःµ
(1) मनीषियों ने शास्त्रों में पांच प्रकार के सेवक बताए हैं। इनमें चार प्रकार
के कर्मकार हैं और पांचवें दास हैं। जिनकी पंद्रह कोटियां हैं।
(2) एक विद्यार्थी, एक प्रशिक्षु, एक भृत्य तथा एक अधिकारी।
(3) मनीषियों ने घोषणा की है कि परावलंबित होना तो सभी के लिए समान
है, किंतु उनकी पृथक स्थिति और आय उनकी अपनी जाति और पेशे पर
निर्भर करती है।
(4) यह बात जान लेने की है कि पेशे दो प्रकार के होते हैं। शुद्ध और गंदे
या पवित्र और अपवित्र गंदे पेशे दास करते हैं जो शुद्ध पेशों को कर्मकार
(शूद्र) करते हैं।