82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जनगणना आयुक्त, इन बातों पर एकमत हैं। ख्1,
इन प्रश्नों में तीसरा सबसे महत्त्व का है। दुर्भाग्य से जनगणना आयुक्त ने इसको नहीं समझा। क्योंकि वह अपनी प्रश्नावली में इस मामले की तह तक नहीं जा सका। उसने यह जानने की कोशिश नहीं की कि अछूत ब्राह्मणों के मंत्र क्यों नहीं लेते? ब्राह्मण का संस्कार क्यों नहीं करते? अछूत अपना ही पुजारी क्यों पसंद करते हैं? और सबकी अपेक्षा इन बातों में फ्क्योंय् का सार्थक महत्त्व है। इन बातों के फ्क्योंय् की जांच करनी चाहिए। क्योंकि अस्पृश्यता उत्पत्ति का मूल कारण इन्हीं में कहीं छिपा हुआ है।
इस जांच के कार्य में आगे बढ़ने से पहले यह बात ध्यान दिला देने की है कि जनगणना आयुक्त की प्रश्नावली एकपक्षीय थी। इससे प्रकट होता है कि ब्राह्मण अछूतों से घृणा करते थे। उसने इस बात को प्रकट नहीं किया कि अछूत भी ब्राह्मणों से घृणा करते हैं। लेकिन यह एक वास्तविकता है। लोगों को यह सोचने का कि ब्राह्मण अछूत से ऊंचा है, इतना अधिक अभ्यास हो गया है कि अछूत भी अपने आपको उससे नीचा मानता है कि यदि लोगों को यह बताया जाए कि अछूत ब्राह्मण को एक अपवित्र व्यक्ति मानते हैं तो उन्हें बड़ा ही आश्चर्य होगा, किंतु जिन लेखकों ने अछूतों के सामाजिक रीति-रिवाजों को ध्यान से देखा है और उनकी परीक्षा की है उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है। इस विषय में किसी भी तरह से संदेह के निवारणार्थ उनके लेखों में से कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं।
श्री अब्बेदूब्याव ख्2, का ध्यान इस ओर गया है। उनका कहना हैःµ
फ्आज भी गांव में एक पैरिया (अछूत) ब्राह्मणों की गली से नहीं गुजर सकता। यद्यपि शहरों में अब कोई उसे ब्राह्मण के घर के पास से गुजरने से नहीं रोकता अथवा
- देखें 1911 की जनगणना, पृष्ठ 40
बंगाल, बिहार और ओडि़सा, पृष्ठ 282
मध्य प्रांत, पृष्ठ 73
मद्रास, पृष्ठ 51
पंजाब, पृष्ठ 109
सं. प्रा., पृष्ठ 121
बड़ौदा, पृष्ठ 55
मैसूर, पृष्ठ 53
राजपूताना, पृष्ठ 105
कोर, पृष्ठ 198
- हिंदू मैनर्स एण्ड कस्टम, तृतीय संस्करण, पृ. 61 पर टिप्पणी।