9. बौद्धों का अपमान-छुआछूत का मूलाधर - Page 98

बौद्धों का अपमानµछुआछूत का मूलाधार

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नहीं रोक सकता। किंतु दूसरी ओर एक पैरिया किसी भी स्थिति में एक ब्राह्मण को अपनी झोंपडि़यों के बीच से नहीं गुजरने देगा। उनका पक्का विश्वास है कि यह उनके विनाश का कारण होगा।य्

तंजावर जिले के गजेटियर के संपादक श्री हेमिंग्जवे का कथन हैःµ

फ्ये जातियां तंजावर जिले की पेरियन, पल्लन या चक्कीलियम अछूत जातित्व किसी ब्राह्मण के अपने मुहल्ले में प्रवेश करने का बड़ा विरोध करती हैं। उनका विश्वास है कि इससे उनकी बड़ी हानि ख्1, होगी।य्

मैसूर के हसन जिले के हौलैंड लोगों के बारे में बताते हुए कैप्टन श्री जे.एस. एफ. मैकेन्जी लिखते हैंः

फ्गांव की सीमा के बाहर हर गांव की फ्हालीगिरीय् है अर्थात खेतिहर दास जो होलियर कहलाते हैं उनके निवास स्थान हैं। मेरा विचार है कि यह इसलिए है कि वे घिनौनी नस्ल के समझे जाते हैं जिनके स्पर्श मात्र से अपवित्रता ख्2, लगती है।य्

सामान्य रूप से जो ब्राह्मण किसी होलियर के हाथ से कुछ भी ग्रहण करने से इंकार करते हैं इसका वही कारण बताते हैं। किंतु ब्राह्मण इसे अपने लिए बड़े सौभाग्य की बात समझते हैं, यदि वे बिना अपमानित हुए हालीगिरी में गुजर जाएं। होलियरों को इस पर बड़ी आपत्ति है। यदि एक ब्राह्मण उनके मुहल्ले में जबरदस्ती घुसे तो सारे के सारे इकट्ठे बाहर आकर उसे जूते मारते हैं और कहा जाता है कि पहले तो उसे जान से भी मार डालते थे। दूसरी जातियों के लोग दरवाजे तक आ सकते हैं किंतु घर में नहीं घुस सकते। क्योंकि उनका प्रवेश अपशकुन समझा जाता था। ऐसा होने से होलियर पर दुर्भाग्य बरस पड़ेगा। यदि कभी कोई किसी तरह से घर के अंदर आ ही घुसे तो मालिक आगन्तुक का कपड़ा फाड़कर उसके एक कोने में नमक बांध देगा और उसे बाहर निकाल देगा। इससे यह समझा जाता है कि सीमोल्लंघन करने वाले घुसपैठिये हो जाने से अपशकुन का प्रभाव मिट जाएगा और घर के मालिक पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आएगी।

इस विचित्र स्थिति की क्या व्याख्या की जा सकती है? इस व्याख्या का पूर्व-स्थिति से तारतम्य होना चाहिए। अर्थात अछूत-अछूत नहीं थे। कहीं से उजड़कर आए कबीले थे अर्थात् छितरे व्यक्ति थे। हमें यह प्रश्न करना चाहिए कि ब्राह्मण ने इन छितरे वर्ग के धार्मिक रीति-रिवाजों के अवसर पर पौरोहित्य करने से क्यों इंकार किया? क्या यह बात है कि खुद ब्राह्मणों ने पौरोहित्य करने से इंकार किया? अथवा यह बात है

  1. गजैटियर आफ तंजोर डिस्ट्रिक्ट (1906), पृष्ठ 80

  2. इण्डियन एंटीक्वेरी 1873 II, 65