94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हैं और अंत में यह मान लेते हैं कि जनता का भला इसी में है कि वे
शासन करते रहें। स्वतंत्रता की हमेशा यह मांग होती है कि राजनीतिक
सत्ता पर अंकुश रखा जाए...।य्
दूसरा सिद्धांत यह है कि जैसे राजा के पास शासन करने का कोई दैविक अधिकार नहीं होता, उसी तरह बहुमत को भी सदैव शासन करने का दैविक अधकिर नहीं होता। बहुमत के शासन को लोग इसलिए स्वीकार कर लेते हैं कि वह एक सीमित अवधि के लिए होता है और इसे बदला जा सकता है। दूसरे, इसलिए कि यह एक राजनीतिक बहुमत का शासन होता है, अर्थात् एक ऐसा बहुमत जो सांप्रदायिक बहुमत के आधार पर नहीं, बल्कि अल्पमत के मतों से बना है। यदि राजनीतिक अल्पमत पर राजनीतिक बहुमत की सत्ता का कार्यक्षेत्र इतना सीमित होता है तो एक संप्रदाय के अल्पसंख्यकों को एक दूसरे समुदाय के बहुसंख्यकों के सदा अधीन किस तरह रखा जा सकता है? एक संप्रदाय के बहुमत को दूसरे संप्रदाय के अल्पमत के वोटों की चिंता किए बिना ऐसा होने देना और वह भी तब जब अल्पसंख्यक इस बात की मांग करते हों, लोकतांत्रिक सिद्धांतों को विकृत करना होता है और यह हिंदू अल्पमत की सुरक्षा और हिफाजत की रत्ती-भर भी चिंता न करने के समान है।
II
अब हम सांप्रदायिक समस्या के फ्व्यापक अभिप्रायय् पर विचार करेंगे। हिंदू किस बात को लेकर इसे एक समस्या मानते हैं? सांप्रदायिक समस्या का व्यापक अभिप्राय मुस्लिम प्रांतों का सोद्देश्य निर्माण करना है। लखनऊ पैक्ट के समय मुसलमानों ने सांप्रदायिक समस्या को केवल कम व्यापक अभिप्राय के रूप में उठाया था। गोलमेज सम्मेलन के समय मुस्लिमों ने पहली बार एक ऐसी योजना प्रस्तुत की जिसमें सांप्रदायिक समस्या को व्यापक अभिप्राय के रूप में रखा गया। 1935 के एक्ट से पहले अधिकांश प्रांत ऐसे थे जहां हिंदू बहुमत में थे और मुस्लिम अल्पमत में। केवल तीन प्रांत ऐसे थे जिनमें मुस्लिम बहुमत में थे और हिंदू अल्पमत में। ये थे पंजाब, बंगाल और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत। इनमें से उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में मुस्लिम बहुत प्रभावकारी नहीं था, चूंकि उस प्रांत में उत्तरदायी शासन नहीं था, और क्योंकि मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार उस प्रांत पर लागू नहीं किए गए थे। इस तरह, व्यवहार में केवल दो प्रांत, अर्थात् पंजाब और बंगाल, ऐसे थे जहां मुस्लिम बहुमत में थे और हिंदू अल्पमत में। मुस्लिमों की इच्छा थी कि मुस्लिम प्रांतों की संख्या बढ़ाई जाए। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मुस्लिमों ने मांग की कि सिंध को कोई बंबई प्रेसिडेंसी से अलग कर दिया जाए और उसे एक स्वशासी प्रांत बना दिया जाए_ और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत का, जो पहले