पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति
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से ही एक अलग प्रांत है, दर्जा बढ़ाकर स्वशासी प्रांत कर दिया जाए। अन्य बातों के अतिरिक्त, विशुद्ध वित्तीय दृष्टि से भी इस मांग को स्वीकार करना संभव नहीं था। न तो सिंध और न उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत वित्तीय दृष्टि से अपने पैरों पर खड़े हो सकते थे। परंतु मुस्लिम मांग को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यह जिम्मेदारी भी स्वीकार कर ली कि सिंध ख्1, और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत ख्2, को केंद्रीय राजस्व में से अनुदान दिया जाए ताकि वे अपने वित्त में बजट-संतुलन स्थापित कर सकें और वित्तीय दृष्टि से अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
अब मुस्लिम बहुमत और हिदू अल्पमत वाले ये चार प्रांत स्वायत्तशासी और स्वशासी प्रांतों की तरह काम करने लगे हैं, परंतु इनका निर्माण न तो प्रशासनिक सुविधा के लिए किया गया था और न ही उनसे कोई वास्तुकीय संतुलन स्थापित हो सका - हिंदू प्रांतों के मुकाबले मुस्लिम प्रांत खड़े करना। यह भी सच है कि मुस्लिम प्रांतों की योजना मुस्लिम अहम को संतुष्ट करने के लिए नहीं थी जो यह मांग कर रहा था कि मुस्लिम बहुमत के अधीन रहने वाले हिंदू अल्पमत से वे हिंदू बहुमत के अधीन रहने वाले मुस्लिम अल्पमत को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति का बदला ले सकें। तब फिर मुस्लिम प्रांत बनाने की योजना के पीछे क्या उद्देश्य था? हिंदू कहते हैं कि मुसलमानों द्वारा वैधानिक बहुमत और पृथक निर्वाचक-मंडल बनाने पर जोर देने का उद्देश्य यह था कि मुस्लिम प्रांतों में रहने वाले मुस्लिमों को संगठित करके एक प्रभावशाली मुस्लिम सत्ता बनाई जाए, जो पूरी तरह और यथासंभव अधिकतम मुसिलम हो। इस तरह मुस्लिम राजनीतिक सत्ता को संगठित करने का तात्पर्य क्या हो सकता था? हिंदू इसका उत्तर यह देते हैं कि इस तरह मुस्लिम प्रांतों में मुस्लिम अपने हाथ में एक कारगर हथियार रखना चाहते हैं, जिससे यदि हिंदू प्रांतों ने मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यक हिंदू अत्याचार किए तो वे भी मुस्लिम प्रांतों में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर सकें। इस तरह यह योजना संरक्षण की एक ऐसी प्रणाली बन जाएगी जिसमें धमाके का उत्तर धमाके से, आतंक का उत्तर आतंक से और अत्याचार का उत्तर अत्याचार से दिया जा सके। यह योजना निश्चित रूप से बड़ी डरावनी है, जिसमें शांति और न्याय की रक्षा के लिए प्रतिकार का तरीका अपनाया जाएगा, ताकि निर्दोष हिंदू अल्पसंख्यकों को मुस्लिम प्रांतों में और मुस्लिम अल्पसंख्यकों को हिंदू प्रांतों में उनके धर्मावलंबियों द्वारा की गई गलतियों की सजा दी जा सके। यह तो सांप्रदायिक बंधक प्रणाली के माध्यम से सांप्रदायिक शांति स्थापित करने की योजना है।
सिंध को प्रतिवर्ष 1,05,00,000 रु. का अनुदान मिलता है।
उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत को प्रतिवर्ष 1,00,00,000 रु. का अनुदान मिलता है।