96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मुस्लिम इस बात को शुरू से ही जानते थे कि सांप्रदायिक आधार पर बनाए गए प्रांतों में इस ढंग से काम किया जा सकता है। यह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के उस भाषण से स्पष्ट है जो उन्होंने 1927 में मुस्लिम लीग के कलकत्ता-अधिवेशन में अध्यक्ष के रूप में दिया था। अपने भाषण में मौलाना ने घोषणा कीः
फ्लखनऊ पैक्ट के द्वारा उन्होंने अपने हित बेच दिए थे। पिछले मार्च के
दिल्ली-प्रस्तावों से पहली बार हिंदुस्तान में मुसलमानों के वास्तविक अधिकारों
को स्वीकार करने का दरवाजा खोल दिया गया। 1916 के पैक्ट द्वारा जो
पृथक निर्वाचक-मंडल प्रदान किया गया उससे केवल मुस्लिम प्रतिनिधित्व
सुनिश्चित हुआ था, परंतु इस समुदाय के अस्तित्व के लिए सबसे महत्वपूर्ण
बात यह थी कि उनकी कुल जनसंख्या की शक्ति को ध्यान में रखा गया।
दिल्ली प्रस्तावों से पहली बार ऐसी परिस्थितियां बनाने का मौका मिला
जिससे उन्हें भविष्य में हिंदुस्तान से समुचित हिस्सा मिलता रहेगा। जनसंख्या
के आंकड़ों के हिसाब से बंगाल और पंजाब में उनका थोड़ा ही बहुमत है,
पर दिल्ली प्रस्तावों से उन्हें पांच प्रांत मिल गए, जिनमें तीन प्रांतों (सिंध,
उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और बलूचिस्तान) में मुस्लिमों का भारी बहुमत
है। यदि मुसलमान इस महत्वपूर्ण कदम को नहीं समझते तो वे जीवित
रहने के लायक ही नहीं हैं। अब पांच मुस्लिम प्रांतों के मुकाबले नौ हिंदू
प्रांत होंगे और इन नौ प्रांतों में हिंदू मुस्लिमों से जैसा बर्ताव करेंगे, पांच
प्रांतों में मुस्लिम हिंदुओं से वैसा ही बर्ताव करेंगे। क्या यह एक बहुत बड़ा
लाभ नहीं है? क्या वह मुस्लिम अधिकारों को जताने का नया हथियार
नहीं मिल गया?य्
जिन लोगों के पास इन मुस्ल्मि प्रांतों का प्रभार है, वे इस योजना के लाभ जानते हैं और जिस अभिप्राय से इसे लागू किया गया था उसका इस्तेमाल करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होगा। यह बंगाल के प्रधानमंत्री फजलुल हक के भाषणों से स्पष्ट होता है।
इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि सांप्रदायिक प्रांतों की इस योजना को सांप्रदायिक समस्या के व्यापक अभिप्राय से सांप्रदायिक अत्याचार का साधन बनाने से इस्तेमाल किया जा सकता है। सांप्रदायिक प्रांतों की योजना का मूल आधार ही बंधक रखने की प्रणाली है, और पृथक निर्वाचक-मंडलों द्वारा इसे जो और मजबूत बनाया गया, इसका किसी भी तरह समर्थन नहीं किया जा सकता। यदि अधिक मुस्लिम प्रांत बनाने के पीछे केवल यही भावना थी, तो यह प्रणाली निस्संदेह बड़ी कुचक्रपूर्ण है।
इस विश्लेषण से इस बारे में कोई संदेह नहीं रहता कि पृथक निर्वाचक-मंडल पर आधारित वैधानिक सांप्रदायिक बहुमत और सांप्रदायिक प्रांत विशेष रूप से इसलिए