6. पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति - Page 107

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

की ओर से) हस्तक्षेप कर सके और उनका अनिष्ठ न होने दें, क्योंकि उसमें उन्हें दबाकर रखने वाली सत्ता की व्यवस्था ही नहीं है। इस तरह पाकिस्तान में हिंदुओं की दशा आसानी से वैसी ही बन जाएगी, जैसी तुर्कों के अधीन आर्मेनियनों की है या यहूदियों की जार के रूस और नाजी जर्मनी में हैं। ऐसी कोई भी योजना असहनीय होगी और हिंदू यह अवश्य ही कह सकते हैं कि उन्हें पाकिस्तान स्वीकार्य नहीं है क्योंकि वे अपने असहाय सहधर्मियों को एक मुस्लिम राष्ट्र में धर्मांधों का शिकार बनते नहीं देख सकते।

III

पाकिस्तान की योजना को लागू करने के परिणामों के बारे में यह एक सुस्पष्ट वर्णन है। परंतु हमें यह जानने की सावधानी बरतनी ही होगी कि इन परिणामों का उद्गम क्या है? क्या वे पाकिस्तान की स्कीम के ही परिणाम हैं या उन सीमाओं के जो पाकिस्तान के लिए निर्धारित की जानी हैं? यदि ये पाकिस्तान की योजना के हैं, अर्थात् वे उसी में अंतर्निहित हैं, तो हिंदुओं को इस पर विचार करने में भी अपना समय बरबाद नहीं करना चाहिए। यदि वे इसे देखते ही रद्द कर दें, तो यह न्यायोचित ही होगा। परंतु यदि ऐसा उसकी सीमाओं के कारण होता है तो पाकिस्तान का प्रश्न केवल उसकी सीमाओं के परिवर्तन का मुद्दा बन जाता है।

पाकिस्तान के प्रश्न का अध्ययन करने से इस विचार को बड़ा बल मिलता है कि पाकिस्तान की बुराइयां उसमें अंतर्निहित नहीं हैं और यदि उसके कुछ बुरे परिणाम निकलते हैं तो वे उसकी सीमाओं के कारण ही हो सकते हैं। अगर हम पाकिस्तान की जनसंख्या के वितरण का अध्ययन करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। यदि ये बुराइयां पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान में पनपती हैं, तो उसका कारण यह है कि वर्तमान सीमाओं से वे एक जाति वोल (सजातीय) देश नहीं बन जाते। वे पहले की तरह मिले-जुले देश बने रहते हैं जहां मुसलमान बहुसंख्यक होंगे और हिंदू अल्पसंख्यक। ये बुराइयां ऐसी बुराइयां हैं जो किसी मिली-जुली जनसंख्या वाले देश से अलग की ही नहीं जा सकतीं। यदि पाकिस्तान को पूरी तरह एकजातीय देश बना दिया जाता है तो ये बुराइयां अपने आप समाप्त हो जाएंगी। तब पाकिस्तान में अलग निर्वाचक-मंडल बनाने का प्रश्न ही नहीं रहेगा, क्योंकि एकजातीय पाकिस्तान में शासन करने वाले बहुसंख्यक और संरक्षण पाने वाले अल्पसंख्यक रहेंगे ही नहीं। इसी तरह यहां एक बहुसंख्यक संप्रदाय नहीं होगा जो एक विरोधी संप्रदाय को अपनी मुट्टòी में कसकर रखे।