पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति
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लें और अपनी सीमाओं में परिवर्तन न करें, ताकि समजातीय राज्य बन सकें। तुर्की, यूनान और बुल्गारिया में यही हुआ। जो जनसंख्या के तबादले का उपहास करते हैं, उनके लिए यह अच्छा होगा कि तुर्की, यूनान और बुल्गारिया के अल्पसंख्यकों की समस्या के इतिहास का अध्ययन करें। यदि वे इसका अध्ययन करेंगे तो उन्हें इस बात का पता चलेगा कि अल्पसंख्यकों की समस्या का एकमात्र प्रभावकारी हल जनसंख्या की अदला-बदली ही है। इन तीनों देशों ने जो काम अपने हाथों में लिया, वह कोई मामूली काम नहीं था। इसमें लगभग 2 करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना था। किंतु बिना हिम्मत हारे हुए इन तीनों ने यह काम पूरा कर दिखाया, क्योंकि उन्हें लगा कि सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का काम अन्य सब कामों से अधिक महत्वपूर्ण है।
यह बात निश्चित है कि सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंख्यकों की अदला-बदली ही है। यदि यही बात है तो फिर यह व्यर्थ होगा कि हिंदू और मुस्लिम संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुर्की और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके, तो यह मानने का कोई कारण नहीं कि हिंदुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहां तो बहुत कम जनता की अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी, और चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है, इसलिए सांप्रदायिक शांति स्थापित करने के एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा।
आलोचना के एक मुद्दे का अब तक उल्लेख नहीं किया गया है। चूंकि यह बात उठाई जा सकती है, इसलिए मैं यहां इसकी चर्चा करना चाहूंगा। यह निश्चित रूप से पूछा जाएगा कि हिंदुस्तान में बच रहे मुस्लिमों के बारे में पाकिस्तान क्या करेगा? यह प्रश्न स्वाभाविक है क्योंकि पाकिस्तान की योजना में बहुसंख्यक मुस्लिमों की चिंता तो की गई है, परंतु उन मुस्लिम अल्पसंख्यकों की उपेक्षा कर दी गई है जिन्हें वास्तव में संरक्षण की आवश्यकता है। परंतु मुद्दा यह है कि यह प्रश्न कौन उठाए? हिंदू तो निश्चित रूप से नहीं उठाएंगे। केवल पाकिस्तान या हिंदुस्तान के मुस्ल्मि इसे उठा सकते हैं। यह प्रश्न पाकिस्तान के मुख्य समर्थक श्री रहमत अली से किया गया था और उन्होंने इस प्रश्न का निम्नलिखित उत्तर दियाः
फ्खास हिंदुस्तान में रहने वाले 4.5 करोड़ मुसलमानों की स्थिति पर इसका