6. पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति - Page 111

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

क्या प्रभाव पड़ेगा? सच्चाई यह है कि इस संघर्ष में उनके बारे में हम

बहुत अधिक चिंतित हैं। वे हमारा ही खून हैं, हमारी ही आत्मा हैं। न हम

उन्हें भूल सकते हैं और न ही वे हमें। उनकी वर्तमान स्थिति और भावी

सुरक्षा हमारे लिए अत्यधिक महत्व की है और भविष्य में भी बनी रहेगी।

वर्तमान स्थिति खराब नहीं होगी। जनसंख्या के आधार पर चार हिंदुओं के

पीछे एक मुसलमान विधानसभाओं में होगा और प्रशासनिक क्षेत्र में उनका

उतना ही प्रतिनिधित्व बना रहेगा जितना कि आज मिला हुआ है। भविष्य

में जो एकमात्र गारंटी हम उन्हें दे सकते हैं, वह है परस्पर आदान-प्रदान

की। इसलिए हम सच्चे दिल से यह प्रतिज्ञा करते हैं कि पाकिस्तान में

गैर-मुस्लिमों को वे सब सुरक्षाएं प्रदान करेंगे जो हिंदुस्तान में मुसलमानों

को मिलेंगी।य्

फ्परंतु जो बात हमें सबसे अधिक बल प्रदान करती है, वह यह

कि वे जानते हैं कि पाकिस्तान की घोषणा ‘मिल्लत’ के सर्वोत्तम हित में

है। यह जितनी हमारे हित में है, उतनी ही उनके हित में। जहां हमारे लिए

यह एक राष्ट्रीय किले के समान होगी, वहीं उनके लिए नैतिक लंगर का

काम करेगी। जब तक यह लंगर टिका रहेगा, सब कुछ सुरक्षित रहेगा या

सुरक्षित बनाया जा सकेगा। पर यदि लंगर ही टूट गया तो सब कुछ नष्ट

हो जाएगा।य्

हिंदुस्तान के मुस्लिमों ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया है, वह भी काफी स्पष्ट है। उनका कहना है - फ्मुस्लिमों का पाकिस्तान और हिंदुस्तान में बटवारा कर देने से हम कमजोर नहीं होंगे, हम हिंदुस्तान की पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर अलग इस्लामी देश बन जाने से अधिक सुरक्षा का अनुभव करेंगे, बजाए इसके कि वे हिंदुस्तान में आत्मसात कर लिए जाएं।य् कौन कह सकता है कि वे गलत हैं? क्या यह नहीं देखा जा चुका है कि जर्मनी अपने यहां रहने वाले सुडेटेन जर्मनों की अपेक्षा चेकोस्लोवाकिया में रहने वाले सुडेटेन जर्मनों की बेहतर सुरक्षा कर सका?य्

जो भी हो, यह प्रश्न हिंदुओं के लिए चिंता का विषय नहीं है। हिंदुओं के लिए चिंतनीय प्रश्न यह है कि पाकिस्तान बनने से हिंदुस्तान में सांप्रदायिक समस्या किस

ऽ ऐसा लगता है कि मुस्लिम लीग ने सुडेटेन जर्मनों के हितों की रक्षा के लिए चेकोस्लोवाकिया के विरुद्ध

जर्मनी की धांसपट्टठ्ठी के तरीकों का गहराई से अध्ययन किया है और यह भी सीखा है कि इन तरीकों

से क्या सबक मिलता है। कराची अधिवेशन, 1937 में दिए गए लीग के धमकी भरे भाषण इस बारे

में दृष्टव्य हैं।