पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति
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इस सारणी से यह देखा जा सकता है कि पाकिस्तान बनने के बाद कितना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के अनुसार, दोनों सदनों में मुस्लिम सीटों का अनुपात कुल सीटों का 33 प्रतिशत है, परंतु हिंदू सीटों के मुकाबले राज्य परिषद में यह अनुपात 66 प्रतिशत और संघीय विधान सभा में 80 प्रतिशत है, अर्थात् लगभग हिंदुओं के बराबर। पर यदि पाकिस्तान बना तो कुल सीटों के मुकाबले राज्य परिषद में मुस्लिम सीटों का अनुपात 33 1/3 प्रतिशत से घटकर 25 प्रतिशत रह जाएगा और संघीय विधान सभा में 21 प्रतिशत, जबकि हिंदू सीटों के मुकाबले राज्य परिषद में यह अनुपात 66 प्रतिशत से घटकर 33 1/3 प्रतिशत और संघीय विधान सभा में 80 प्रतिशत के मुकाबले 40 प्रतिशत रह जाएगा। इन आंकड़ों में यह मानकर चला गया है कि हिंदुस्तान के पाकिस्तान से अलग होने के बावजूद मुस्लिमों को अधिकाधिक प्रतिनिधित्व दिया जाता रहेगा। यदि मुस्लिमों को दिया जाने वाला वज़न रद्द कर दिया गया या कम कर दिया गया तो हिंदुओं का प्रतिनिधित्व और भी अधिक बढ़ जाएगा। परंतु मान लीजिए कि वज़न में कोई भी परिवर्तन नहीं किया जाता, तो भी क्या केंद्र में हिंदुओं को प्रतिनिधित्व की दृष्टि से कम लाभ होगा? मेरे विचार से केंद्र में हिंदुओं की स्थिति में बहुत अधिक सुधार हो जाएगा, परंतु यदि वे पाकिस्तान का विरोध करेंगे तो उन्हें यह लाभ नहीं मिलेगा।
ये तो पाकिस्तान बनने के भौतिक लाभ हैं। एक और मनोवैज्ञानिक लाभ भी है। दक्षिण और मध्य भारत के मुस्लिम उत्तर और पूर्व के मुस्लिमों से प्रेरणा लेते हैं। यदि पाकिस्तान बनने से उत्तर और पूर्व में सांप्रदायिक शांति स्थापित हो जाती है, क्योंकि तब कोई अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक नहीं रहेंगे, तो हिंदू ठीक ही यह आशा कर सकते हैं कि हिंदुस्तान में सांप्रदायिक शांति स्थापित हो जाएगी। उत्तर और पूर्व