6. पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति - Page 115

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के मुस्लिमों और हिंदुस्तान के मुस्लिमों के बीच का सूत्र समाप्त हो जाएगा और यह हिंदुस्तान के हिंदुओं के लिए एक और लाभ होगा।

पाकिस्तान बनने से होने वाले इन प्रभावों पर विचार किया जाए तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यदि पाकिस्तान से हिंदुस्तान के भीतर सांप्रदायिक समस्या पूरी तरह हल नहीं होती तो भी एक जोरदार भागीदार के रूप में मुस्लिमों की आपाधापी से हिंदू मुक्त हो जाएंगे। यह सोचना हिंदुओं का काम है कि क्या एक ऐसे प्रस्ताव को महज इसलिए रद्द कर दिया जाए कि इससे पूरा समाधान नहीं निकलता। ज्यादा नुकसान के मुकाबले कुछ फायदा भी बेहतर है।

IV

अब एक अंतिम प्रश्न और उसके बाद सांप्रदायिक शांति के संदर्भ में पाकिस्तान के बारे में यह विचार-विमर्श समाप्त किया जा सकता है। क्या पंजाब और बंगाल के हिंदू और मुस्लिम अपने प्रांतों का सीमांकन नए सिरे से करने को तैयार हो जाएंगे, ताकि पाकिस्तान की योजना को अधिकाधिक दोषरहित बनाया जा सके?

जहां तक मुस्लिमों का सवाल है, उन्हें नए सिरे से सीमांकन करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि वे आपत्ति करते हैं, तो यही कहना पड़ेगा कि वे

खुद अपनी मांग को नहीं समझते। ऐसा बिलकुल संभव है, क्योंकि पाकिस्तान के समर्थकों में जो चर्चा चल रही है वह बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना और असंयत है। कुछ लोग पाकिस्तान को मुस्लिम कौमी वतन (मुस्लिम नेशनल होम) जबकि अन्य मुस्लिम कौमी रियासत (मुस्लिम नेशनल स्टेट) का नाम देते हैं। कौमी रियासत और कौमी वतन में अंतर होता है। और यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। यह अंतर क्या होता है, इस बारे में फिलस्तीन में यहूदियों के लिए कौमी वतन बनाने के समय विस्तार से विचार किया गया था। यदि मुस्लिमों के सीमांकन के बारे में संभावित विरोध पर काबू पाना है तो इस भीतरी धारणा को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है। एक अधिकृत विद्वान के अनुसारः

फ्कौमी वतन एक ऐसा क्ष्ज्ञेत्र होता है जिसमें लोगों को राजनीतिक प्रभुता

का अधिकार पाए बिना भी एक स्वीकृत वैध स्थिति मिली होती है, जहां

उन्हें अपने नैतिक, सामाजिक और बौद्धिक आदर्शों को पूरा करने का

अधिकार होता है।य्

1922 में स्वयं ब्रिटिश सरकार ने अपनी फिलस्तीन नीति के बारे में जारी वक्तव्य में कौमी वतन की धारणा की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में की थीः