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पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति

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फ्जब यह पूछा जाता है कि फिलस्तीन में यहूदियों के कौमी वतन का

विकास करने का क्या मतलब है, तो इसका उत्तर यह हो सकता है कि यह

वहां के निवासियों पर यहूदी राष्ट्रीयता थोपना नहीं है, बल्कि वर्तमान यहूदी

समुदाय का विश्व के अन्य भागों में रहने वाले यहूदियों की सहायता से

और अधिक विकास करना है, ताकि यह एक ऐसा केंद्र बन जाए, जिसमें

तमाम यहूदी लोग धर्म और प्रजाति के आधार पर रुचि लें और गर्व करें।

परंतु इस समुदाय को अपने मुक्त विकास के सर्वोत्तम अवसर मिल सकें

और यहूदी लोगों को अपनी क्षमताएं दिखाने का पूरा मौका मिल सके। यह

आवश्यक है कि यहूदी लोग समझें कि वहां वे अपने अधिकार से रह रहे

हैं, इसलिए नहीं कि लोग उन्हें सहन कर रहे हैं। ऐसा होना आवश्यक है।

यही कारण है कि इस बात की अंतर्राष्ट्रीय गारंटी दी जाए कि फिलस्तीन

यहूदियों का कौमी वतन है और इसे प्राचीन ऐतिहासिक संबंधों के आधार

पर औपचारिक रूप से मान्यता दी जाए।य्

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कौमी वतन और कौमी रियासत में एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। यह अंतर इस तथ्य में होता है कि कौमी वतन में रहने वाले लोगों को क्षेत्र के ऊपर राजनीतिक प्रभुता नहीं मिलती और उस क्षेत्र में रहने वाले अन्य लोगों पर वे अपनी राष्ट्रीयता नहीं थोप सकते। उन्हें जो मिलता है वह यह है कि उनकी वैध स्थिति को स्वीकार करके यह गारंटी दी जाती है कि वहां उन्हें नागरिक के रूप में रहने तथा अपनी संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार होगा। कौमी रियासत में रहने वाले लोगों को राजनीतिक प्रभुता मिलती है और यहां रहने वाले दूसरे लोगों पर वे अपनी राष्ट्रीयता थोप सकते हैं।

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है और इसे ध्यान में रखते हुए ही पाकिस्तान की उनकी मांग की जानी चाहिए। मुस्लिम लोग पाकिस्तान की मांग किसलिए करते हैं? यदि वे मुस्लिमों का कौमी वतन बनाने के लिए पाकिस्तान चाहते हैं, तो पाकिस्तान की कोई जरूरत नहीं। पाकिस्तानी प्रांतों में उन्हें पहले से ही कौमी वतन मिला हुआ है, जिसमें उन्हें रहने और अपनी संस्कृति को बढ़ाने के अधिकार मिले हुए हैं। यदि वे पाकिस्तान को कौमी मुस्लिम रियासत बनाना चाहते हैं, तो वे उसमें सम्मिलित क्षेत्र पर अपनी राजनीतिक प्रभुता चाहते हैं। इसका उन्हें अधिकार है। परंतु सवाल यह है कि क्या उन्हें इन मुस्लिम रियासतों के भीतर गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अपनी प्रजा बनाकर रखने की अनुमति देनी चाहिए और उन पर मुस्लिम रियासतों की कौमियत थोपने का अधिकार होना चाहिए? निस्संदेह यह अधिकार राजनीतिक प्रभुता के अनुषंगी रूप में स्वीकार किया जाता है। परंतु यह भी उतना ही सच है