6. पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति - Page 117

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कि आधुनिक काल में और मिश्रित राज्यों में यह अधिकार शरारतों का साधन बन गया है। पाकिस्तान बनने से ऐसी शरारतों की संभावना से इन्कार करना हालिया इतिहास के रक्तिम पृष्ठों को न पढ़ने जैसा होगा, जिनमें तुर्कों, यूनानियों, बुल्गारियनों और चैक लोगों द्वारा अपने अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किए गए अत्याचारों, हत्याओं, लूटपाट और आगजनी की घटनाएं अंकित हैं। किसी रियासत से अपनी प्रजा पर अपनी राष्ट्रीयता थोपने का अधिकार वापस लेना संभव है, क्योंकि यह राजनीतिक प्रभुता से उपजा है। परंतु यह भी संभव है कि ऐसे अधिकार को अमल में लाने का अवसर ही न दिया जाए। ऐसा तब किया जा सकता है जब मुस्लिमों को ऐसी कौमी मुस्लिम रियासत बनाने की अनुमति दी जाए जो संप्रदाय की दृष्टि से पक्के तौर पर सजातीय हो। किसी भी परिस्थिति में उन्हें ऐसे मिश्रित राज्य बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिनमें हिंदुओं के विरोधी मुस्लिम हों और उनकी संख्या हिंदुओं से कहीं अधिक हो।

शायद पाकिस्तान के विचार के निर्माता मुस्लिमों ने इस बात पर कभी गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया। इस स्कीम के मूल प्रणेता सर मुहम्मद इकबाल ने तो निश्चित रूप से इस बारे में कभी नहीं सोचा था। 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि वह अंबाला डिवीजन और कुछ ऐसे जिलों को छोड़ देने के लिए राजी हो जाएंगे, जिनमें गैर-मुस्लिम अधिक संख्या में रहते हैं। इसका कारण यह था कि उन्हें छोड़ देने से उसका विस्तार कम हो जाएगा और उसकी आबादी में मुस्लिम अधिक हो जाएंगे। दूसरी ओर यह भी संभव है कि जो लोग पाकिस्तान की स्कीम प्रस्तुत कर रहे हैं उन्होंने यही सोचा हो कि इसमें पंजाब और बंगाल अपनी वर्तमान सीमाओं सहित रहेंगे। उनको यह बात साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि वर्तमान सीमाओं पर जोर देने से वे ऐसे हिदुंओं को भी नाराज कर देंगे जो इस प्रश्न पर खुले दिमाग से सोचते हैं। हिंदुओं से इस बात की आशा कभी नहीं की जा सकती कि वे हिंदुओं को उस मुस्लिम रियासत में सम्मिलित करने की सहमति दे देंगे जो जान-बूझकर मुस्लिम मत और मुस्लिम संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए बनाई जा रही है। हिंदू निस्संदेह इसका विरोध करेंगे। मुसलमानों को यह कतई नहीं समझना चाहिए कि इसका पता चलने में बहुत देर लगेगी। यदि मुस्लिम वर्तमान सीमाओं को बनाए रखने पर जोर देंगे तो उन पर यह आरोप लग सकता है कि पाकिस्तान की मांग के पीछे एक कौमी वतन या कौमी रियासत बनाने के बजाए कोई निहायत घटिया चाल है। उन पर इस बात का इल्जाम लगेगा कि वे मुस्लिम क्षेत्रों में बहुसंख्यक मुस्लिमों के हाथों में हिंदू अल्पसंख्यकों को बंधक बनाकर रखना चाहते हैं।

इसलिए इन बातों पर मुस्लिमों को विचार करना चाहिए कि पाकिस्तान बनाने के लिए प्रांतों की सीमाएं बदलना उनके लिए क्यों श्रेयस्कर है।