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पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति

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अब, पंजाब और बंगाल के हिंदुओं को किन विशिष्ट बातों पर विचार करना चाहिए? इस मुद्दे पर दो पार्टियों, अर्थात् हिंदू और मुस्लिम, में हिंदू अधिक कठोर हैं। इस बारे में केवल ऊंची जातियों के हिंदुओं की प्रतिक्रिया जानना काफी है, क्योंकि वे ही हिंदू जनता का मार्गदर्शन करते हैं और हिंदू जनमत का निर्माण करते हैं। दुर्भाग्यवश, ऊंची जातियों के हिंदू लोग नेता के रूप में बहुत घटिया होते हैं। उनके चरित्र में कोई ऐसा गुण है जिससे हिंदू आमतौर पर घोर विपत्ति में पड़ जाते हैं। उनका यह गुण इस कारण बनता है कि वे सब कुछ स्वंय हासिल करना चाहते हैं और जीवन की अच्छी चीजें दूसरों से मिल-बांटना नहीं चाहते। उनके पास शिक्षा और शक्ति या अधिकार का एकाधिकार है, और शक्ति और शिक्षा से ही वे राज्य पर काबिज हो गए हैं। उनके जीवन की आकांक्षा और लक्ष्य यही है कि उनका यह एकाधिकार बना रहे। अपने वर्ग का प्रभुत्व बनाए रखने में ही उनका स्वार्थ है और इसीलिए वे नीची जातियों के हिंदुओं को अधिकार या शक्ति, शिक्षा और सत्ता से वंचित रखने के लिए हर संभव उपाय अपनाते हैं_ और इसका सबसे निश्चित और प्रभावकारी उपाय है ऐसे धर्मग्रन्थों की रचना जिनके द्वारा नीची जातियों के हिंदुओं के दिमाग में यह पाठ बिठा दिया जाता है कि उनके जीवन का कर्तव्य केवल ऊंची जातियों के हिंदुओं की सेवा करना है। अपने हाथों में यह एकाधिकार रख कर और नीची जातियों को इसमें से कुछ भी न देकर, ऊंची जातियों के हिंदू बहुत लंबे समय से इस काम में असीम सफलता प्राप्त करते रहे हैं। यह तो हाल की ही बात है कि नीची जातियों के हिंदू इस एकाधिकार के विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने मद्रास में और बंबई प्रेसीडेंसी में और मध्य प्रांत में गैर-ब्राह्मण पार्टियां बनाई हैं। परंतु ऊंची जातियों के हिंदुओं ने अब भी विशेष सुविधाएं प्राप्त कर रखी हैं। उनका यही दृष्टिकोण है कि शिक्षा, शक्ति या अधिकार और सत्ता को अपने ही हाथों में रखा जाए और दूसरे किसी को इनका लाभ न उठाने दिया जाए। ऊंची जातियों के हिंदुओं ने नीची जातियों के हिंदुओं के बारे में अपना जो दृष्टिकोण बना रखा है, उसे ही वे मुस्लिमों पर भी लागू करना चाहते हैं। जो कुछ उन्होंने नीची जातियों के हिंदुओं के साथ किया है, उसी तरह वे मुस्लिमों को श्रेणी और सत्ता से अलग रखना चाहते हैं। ऊंची जातियों के हिंदुओं की राजनीति को समझने के लिए उनके इस गुण को समझना आवश्यक है।

दो उदाहरणों से उनका यह गुण स्पष्ट हो जाता है। 1929 में हिंदुओं ने साइमन कमीशन के आगे सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग करने का जोरदार और डटकर विरोध किया। परंतु 1915 में सिंध के हिंदुओं ने उसके विपरीत तर्क प्रस्तुत किए थे और सिंध को बंबई से अलग करने की मांग की थी। इन दोनों मांगों के पीछे कारण