116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
चाहते हैं तो उन्हें अफगानिस्तान और सीमांत क्षेत्रों पर विजय पानी चाहिए
और सभी पहाड़ी कबायलियों का धर्म-परिवर्तित करना चाहिए।य् ख्1,
मैं नहीं जानता कि कितने हिंदू पाकिस्तान के विकल्पस्वरूप लाला हरदयाल की इस योजना को समर्थन देंगे।
पहली बात तो यह है कि हिंदू धर्म धर्म-परिवर्तन करने वाला धर्म नहीं है। मौलाना मुहम्मद अली ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने भाषण में ठीक ही कहा थाः
फ्लंबे समय से हिंदू धर्म के विरुद्ध मेरी एक शिकायत रही है एक बार
1907 में इलाहाबाद में अपने भाषण में मैंने हिंदुओं और मुसलमानों में
फर्क बताते हुए कहा था कि एक मुस्लिम के बारे में सबसे खराब बात
यह कही जा सकती है कि उसका खाना बेस्वाद होता है, परंतु वह उसे
राजाओं के लायक बताता है और सबके साथ मिलकर खाना चाहता है,
और वह उसे उनके मुंह में भी ठूंस देगा जो उसे पसंद नहीं करते और न
खाना ही चाहते हैं। दूसरी ओर, उसका हिंदू मित्र, जिसे अपनी पाक-विद्या
पर गर्व है, चुपके-से अपनी रसोई में घुसकर अकेले ही लपालप वह सब
खा जाएगा, जो उसने पकाया है और उस पर वह अपने भाई की भी परछाई
तक नहीं पड़ने देगा और उसके लिए एक कौर तक नहीं छोड़ेगा। यह
बात हल्के ढंग से नहीं कही गई थी, और एक बार तो मैंने महात्मा गांधी
से सचमुच यह पूछा था कि अपने धर्म की इस विशिष्टता का औचित्य
बताएं।य्
उनके इस प्रश्न का महात्मा ने क्या उत्तर दिया, यह श्री मुहम्मद अली ने नहीं बताया_ तथापि सच्चाई यह है कि हिंदू चाहे कितना भी क्यों न चाहें, हिंदू धर्म को वे इस्लाम या ईसाइयत की तरह उपदेशक धर्म नहीं बना सकते। यह बात नहीं है कि हिंदू धर्म कभी उपदेशक धर्म रहा ही नहीं_ बल्कि एक समय तो यह उपदेशक धर्म था ही, अन्यथा इस बात की व्याख्या करना संभव नहीं कि विशाल भारतीय उपमहाद्वीप में यह कैसे फैल जाता। ख्2, किंतु जातिप्रथा (धर्म) परिवर्तन के साथ नहीं चल सकती थी। एक अपरिचित को अपने धर्म में परिवर्तित करने के लिए किसी समुदाय का उसे अपना धर्म ही देना पर्याप्त नहीं होता, जाति के नाते भी उसे इस स्थिति में होना चाहिए कि धर्म परिवर्तित व्यक्ति को अपने में मिलाकर अपनी
देखिए, टाइम्स ऑफ इंडिया, 25.7.1925, ‘थू्र इन्डियन आईज़’।
इस सवाल के बारे में एक हिंदू धर्म मिशनरी धर्म था या नहीं, और यदि वह मिशनरी धर्म था तो फिर
मिशनरी धर्म रहा क्यों नहीं, इसके लिए देखिए मेरा लेख ‘कास्ट एंड कनवर्शन’ जो तेलुगू समाचार के
1926 के वार्षिकांक में प्रकाशित हुआ था।