6. पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति - Page 126

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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बिरादरी में शामिल कर लिया जाए। धर्म-परिवर्तन की यह पूर्व शर्त पूरी करना हिंदू समाज के लिए संभव नहीं था। एक मिशनरी धर्म प्रचारक की भावना वाले हिंदू को इस बात से कोई नहीं रोकता कि वह किसी अपरिचित को अपने धर्म में शामिल कर ले। किंतु जब वह अपरिचित को अपने धर्म में शामिल करता है, तो इस प्रश्न का सामना अवश्य करना पड़ेगा कि धर्म परिवर्तन वाले व्यक्ति की जाति क्या होगी। हिंदू धर्म के अनुसार, वह जिस जाति में पैदा हुआ है, वही उसकी जाति होगी। धर्म परिवर्तित व्यक्ति तो किसी जाति में पैदा नहीं हुआ। इसलिए वह किसी जाति का नहीं होता। यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। राजनीतिक या धार्मिक होने से भी अधिक, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। भले ही उसका कोई धर्म न हो, धर्म होने की जरूरत भी नहीं। उसे किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की आवश्यकता नहीं है। पर उसका समाज होना चाहिए। वह बिना समाज के नहीं रह सकता। जब धर्म परिवर्तन वाले व्यक्ति के लिए कोई समाज ही नहीं होगा, तो फिर धर्म-परिवर्तन कैसे हो सकता है? जब तक हिंदू समाज स्वतंत्र और स्वजातीय वर्गों में बंटा रहेगा, हिंदू धर्म मिशनरी धर्म नहीं हो सकता। इसलिए अफगानों और पहाड़ी कबायलियों का धर्म-परिवर्तन करना महज एक स्वप्न है।

एक दूसरी बात यह है कि लाला हरदयाल की योजना के लिए इतने अधिक धन की जरूरत पड़ेगी जिसका हिसाब तक लगाना संभव नहीं है। अफगानों और सरहदी कबायलियों को हिंदू धर्म में परिवर्तित करने के लिए धन कौन देगा? हिंदुओं ने दीर्घ काल से अन्य लोगों का धर्म-परिवर्तन करके अपने धर्म में शामिल करना बंद कर दिया है, इसलिए उनमें धर्म-परिवर्तन के लिए कोई उत्साह भी नहीं है। इस उत्साह के अभाव में धन एकत्र करने पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा, चूंकि हिंदू समाज चतुर्वर्ण व्यवस्था पर आधारित है, इसलिए अत्यंत प्राचीन काल से ही हिंदू समाज में धन-संपदा का वितरण बहुत असमान है। हिंदुओं में केवल बनिए को ही धन-संपदा का वारिस समझा जाता है। निःसंदेह विदेशी आक्रमणकारियों या देशी विद्रोहियों के कारण जमींदारों का एक वर्ग बन गया है, किंतु उनकी संख्या इतनी अधिक नहीं जितनी बनियों की है। बनिया पैसे का होता है और उसके सारे धंधे नफा कमाने के लिए होते हैं। उसे धन का सिर्फ एक ही उपयोग करना आता है कि उसे अपनी मुट्टòी में जकड़े रहो और मरने पर अपने वारिसों के लिए छोड़ जाओ। धर्म के प्रचार-प्रसार या संस्कृति को समझना और उसका संवर्धन करना उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। उसके व्यय में तो अच्छी तरह रहना भी शामिल नहीं होता। यह उसकी युगों-युगों से परंपरा रही है। यदि उसे धन मिलने की आशा हो तो उसके लिए जीवन का आचार-विचार और तरीका लगभग जल्लाद जैसा ही होता है। उसने अपने खर्चे में केवल एक और नए काम के लिए धन खर्च करना सीखा है और