पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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तथापि यह कहना श्री सावरकर के प्रति न्याय नहीं होगा कि भारतीय मुस्लिमों के दावे के बारे में उनका दृष्टिकोण केवल नकारात्मक है। उनके प्रस्ताव के उत्तर में श्री सावरकर ने कुछ ठोस प्रस्ताव भी रखे हैं।
उन ठोस प्रस्तावों को समझने के लिए जरूरी है कि पहले हम उनकी कुछ बुनियादी धारणाओं को समझ जाएं। श्री सावरकर इस बात पर बहुत जोर देते हैं कि हमें हिंदुइज्म, हिंदुत्व और हिंदुडम, इन तीन शब्दों को अच्छी तरह समझना चाहिए। वे कहते हैंः
फ्हिन्दू आंदोलन की विचारधारा की व्याख्या करते समय यह नितांत आवश्यक
है कि इन तीनों शब्दों को ठीक से समझ लिया जाए। ‘हिंदू’ शब्द से
अंग्रेजी में एक शब्द ‘हिंदुइज्म’ बनाया गया है। इसका तात्पर्य है वह धार्मिक
विचारधारा या धर्म का दर्शन, जिसका हिंदू लोग अनुकरण करते हैं। दूसरा
शब्द ‘हिन्दुत्व’ कहीं अधिक व्यापक है और इसमें ‘हिंदुइज्म’ की तरह
न केवल हिंदुओं के ही धार्मिक दर्शन को लिया गया है, बल्कि इसके
अंतर्गत उनके सांस्कृतिक, भाषायी, सामाजिक और राजनीतिक पहलू भी
आ जाते हैं। यह शब्द कमोबेश ‘हिंदू राजतंत्र’ (हिंद पोलिटी) के अधिक
समीप है और इसका निकट अनुवाद हिंदुयन होगा। तीसरे शब्द ‘हिंदुडम’
का तात्पर्य सामूहिक रूप से हिंदू समुदाय की बात करना है। यह हिंदू
जगत का सामूहिक नाम है, जैसे ‘इस्लाम’ मुस्लिम जगत का प्रतीक है।ऽ
श्री सावरकर का मानना है कि हिंदू महासभा को एक धार्मिक संस्था कहना अत्यंत गलत निरूपण करना है। वह कहते हैंः
फ्यह बात मेरे ध्यान में लाई गई है कि अधिसंख्य अंग्रेजी पढ़े-लिखे हिंदू
इस गलतफहमी के कारण हिंदू महासभा में शामिल नहीं होते कि यह
ईसाई मिशन की तरह महज एक धार्मिक संगठन है। यह बात एकदम
असत्य है। हिंदू महासभा हिंदू मिशन नहीं है। इसने ईश्वरवाद और यहां तक
कि अनीश्वरवाद या नास्तिकता जैसे धार्मिक प्रश्नों पर विचार करने और
निर्णय लेने का काम विभिन्न हिंदू धार्मिक संगठनों पर छोड़ दिया है। यह
हिंदू-धर्म महासभा नहीं है, बल्कि हिंदू राष्ट्रीय महासभा है। परिणामस्वरूप,
इसका विधान यह छूट नहीं देता कि यह हिंदू धर्म के ही किसी मत या
संप्रदाय का या धार्मिक संस्था का साझीदार बने। एक राष्ट्रीय हिंदू संगठन
ऽ1 दिसम्बर, 1939 को हिंदू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन में दिया गया भाषण, पृ. 14