भाग - III पाकिस्तान नहीं तो क्या? - Page 129

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

होने के नाते, यह राष्ट्रीय हिंदू चर्च का प्रचार और उसकी रक्षा करेगा,

जिसके अंतर्गत यह हिंदुस्तानी मूल के किसी एक हिंदू संप्रदाय या सभी

हिन्दू संप्रदायों के ऊपर गैर-हिंदुओं द्वारा होने वाले आक्रमणों या अतिक्रमणों

से रक्षा करेगा। परंतु इसकी गतिविधियों का कार्यक्षेत्र मात्र धार्मिक संगठन

से अधिक व्यापक व बोधगम्य है। हिंदू महासभा हिंदुडम (हिंदूपन), हिंदू

जगत के सांगोपांग राष्ट्रीय जीवन से अपने आपको जोड़ती है, उसके सभी

सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सबसे बढ़कर राजनीतिक पहलुओं से

जोड़ती है, और उन सब चीजों की रक्षा करने और उन्हें बढ़ावा देने के

लिए कटिबद्ध है, जिनसे हिंदू राष्ट्र की स्वतंत्रता, शक्ति और सम्मान बढ़ता

है और इस लक्ष्य की प्राप्ति का एक अपरिहार्य साधन हैः पूर्ण स्वराज्य

की प्राप्ति, सभी वैध और उचित साधनों द्वारा हिंदुस्तान की पूर्ण राजनीतिक

स्वतंत्रता।य्ऽ

श्री सावरकर इस बात को स्वीकार नहीं करते कि हिंदू महासभा मुस्लिम लीग का प्रतिरोध करने के लिए शुरू की गई थी और जैसे ही कम्यूनल एवार्ड से पैदा होने वाली समस्याओं का हिदुंओं-मुसलमानों दोनों को संतुष्ट करने वाला हल निकल आएगा, हिंदू महासभा तिरोहित हो जाएगी। श्री सावरकर इस बात पर जोर देते हैं कि भारत के राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद भी हिंदू महासभा को काम करते रहना चाहिए। वह कहते हैंः

फ्कई अल्पज्ञ आलोचक इस बात की कल्पना करते हैं कि महासभा की

स्थापना केवल मुस्लिम लीग पर काबू रखने या कांग्रेस के वर्तमान नेताओं

की हिंदू-विरोधी नीतियों की प्रतिक्रिया स्वरूप की गई थी, और जब उसका

यह बनावटी बहाना खत्म हो जाएगा तो वह स्वतः समाप्त हो जाएगी। परंतु

यदि महासभा के उद्देश्यों और लक्ष्यों का कोई अर्थ है तो उससे यह स्पष्ट

हो जाएगा कि वह भावुकतावश व्यर्थ के विचारों के कारण नहीं बनाई गई

थी, न ही वह किसी एक शिकायत विशेष को दूर करने के लिए या किसी

मौसमी पार्टी का विरोध करने के लिए बनाई गई थी। सच्चाई यह है कि

कोई भी सजीव रचना चाहे व्यक्ति हो या संगठन हो, जो जीवित हो और

जिसका जीवित रहना वांछनीय हो, जब उसे किसी प्रतिकूल वातावरण का

सामना करना पड़ता है तो वह आक्रामक और सुरक्षात्मक, दोनों प्रकार के

उपाय काम में लाने लगता है। हिंदू राष्ट्र भी कांग्रेस की छद्म राष्ट्रीयता की

ऽदिसम्बर, 1939 में हिंदू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन में दिया गया भाषण, पृष्ठ-25