122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
शताब्दी तक तो इस बात का खतरा बना रहेगा कि मुस्लिम अल्पसंख्यक
दंगे कराते रहें, नौकरियों, विधानसभाओं आदि में सीटों के लिए झगड़े करते
रहें, अपनी जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक प्रतिनिधित्व की मांगें करते
रहें और इस तरह आंतरिक शांति के लिए निरंतर खतरा बने रहें। यदि हम
बुद्धिमान हैं तो इस संभावना पर नियंत्रण रखने के लिए हमें हमेशा इस
बात को ध्यान में रखना होगा कि स्वायत्तशासी देश का दर्जा प्राप्त करने
के बाद भी हिंदू जगत का हिंदू महासभा जैसा एक ऐसा मजबूत संगठन
होना चाहिए जो हिंदुओं के लिए शक्ति का स्रोत हो, सुरक्षित बल जैसा
हो, जिसकी मार्फत वे संयुक्त संसद की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली ढंग
से अपनी शिकायतें सामने ला सकें, आगे आने वाले खतरों का अनुमान
लगा सकें, समय रहते हिंदुओं को उसके विरुद्ध चेतावनी दे सकें और
आवश्यकता पड़ने पर किसी के नापाक इरादों के विरुद्ध लड़ सकें, क्योंकि
संयुक्त राज्य तो अनजाने में इन चीजों का शिकार बन जाएगा।
कनाडा और फिलिस्तीन के इतिहास से और युवा तुर्कों के आंदोलन
से आपको पता चलेगा कि जिस देश में भी भारत के हिदुओं और मुसलमानों
की तरह दो या अधिक परस्पर विरोधी गुट होते हैं, तो उनमें से जो अधिक
बुद्धिमान होता है, उसे अपना एक अनन्य अक्षत, शक्तिशाली और चौकन्ना
संगठन बनाए रखना होता है, जो विरोधी गुट के राज्य पर कब्जा करने के
विश्वासघाती प्रयत्नों पर नजर रख सके और उसे विफल कर सके, विशेषकर
उस समय जब उस गुट की बाहरी देशों के प्रति धार्मिक-सांस्कृतिक निष्ठा
हो और विदेशी सीमांत राज्यों के साथ उसके संबंध हों।य्ऽ
हिंदुस्तान और हिंदू महासभा के बारे में अपना दृष्टिकोण देने के बाद श्री सावरकर यह बताते हैं कि स्वराज से उनका तात्पर्य क्या है। श्री सावरकर के अनुसारः
फ्स्वराज का तात्पर्य है कि हिंदुओं के लिए उनका अपना स्वराज्य होना
चाहिए, जिसमें उनका हिंदुत्व प्रभावी हो, जिस पर गैर-हिंदू लोगों का प्रभुत्व
न हो, चाहे वे हिंदुस्तान की सीमा में रहने वाले हों, या उसकी सीमा के
बाहर। कुछ अंग्रेज ऐसे हैं भी, और हो भी सकते हैं, जो भारत की सीमा
में पैदा हुए हों। अतः क्या इन एंग्लो-इंडियनों का प्रभुत्व हिदुओं के लिए
‘स्वराज्य’ हो सकता है? औरंगज़ेब या टीपू सुल्तान वंश-परंपरा की दृष्टि
ऽ वही भाषण, 1939, पृ. 24-27