124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इन नामों को बिगाड़ा नहीं, बिगाड़ने की हिम्मत तक नहीं की, और जब
जरूरत पड़ती है तो वे अपने आपको पॉलिश मुस्लिम, यूनानी मुस्लिम या
चीनी मुस्लिम कहते हैं। इसलिए जब वे प्रादेशिक दृष्टि से अपने आपकी
अलग पहचान बताना चाहें तो वे स्वंय को हिंदुस्तानी मुस्लिम कह सकते
हैं। इससे उन्हें अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक भिन्नता को दांव पर लगाने
की जरूरत नहीं। बल्कि जबसे मुस्लिम हिंदुस्तान में रह रहे हैं, वे अपनी
मर्जी से अपने को हिंदुस्तानी कह रहे हैं। परंतु इस सबके बावजूद, यदि
हमारे देशवासियों में कुछ उग्र मुस्लिम वर्ग इस नाम पर भी आपत्ति करे तो
यह उसकी कोई वजह नहीं कि हम अपनी अंतरात्मा के लिए भी कायर
बन जाएं। हम हिंदुओं को अपने राष्ट्र की उस निरंतरता को नहीं तोड़ना
चाहिए जो ऋग्वैदिक काल के ‘सिंधु’ से वर्तमान पीढ़ी के हमारे हिंदुओं
तक चली आ रही है और जो ‘हिंदुस्तान’ में निहित है और जो हमारी
मातृभूमि का स्वीकृत नाम है। जैसे जर्मनों की भूमि जर्मनी है, अंग्रेजों की
इंग्लैंड है, तुर्कों की तुर्किस्तान है, अफगानों की अफगानिस्तान है, उसी
तरह हमें विश्व के नक्शे पर अमिट रूप से ‘हिंदुस्तान’ शब्द अंकित कर
देना चाहिए। अर्थात्, हिंदुओं की भूमि।य् ख्1,
दूसरी बात है संस्कृत को हिंदू जगत की देवभाषा के रूप में, हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में, और नागरी को लिपि के रूप में स्वीकार किया जाएः
फ्संस्कृत’ हमारी देवभाषा ख्2, और संस्कृतनिष्ठ हिंदी ख्3, हमारी राष्ट्रभाषा होगी,
जो संस्कृत से निकली है और उसी से समृद्ध होती है, चूंकि संस्कृत विश्व
की प्राचीन भाषाओं में सबसे समृद्ध और सबसे सुसंस्कृत भाषा है और हम
हिंदुओं के लिए सभी भाषाओं में सबसे अधिक पवित्र है। क्योंकि हमारे
प्राचीन धर्मग्रंथ, इतिहास, दर्शन - सभी की जड़ें संस्कृत-साहित्य में इतनी
गहरी जमी हुई हैं कि वह हमारी जाति का मस्तिष्क और बुद्धि बन गया
है। संस्कृत हमारी अधिकांश मातृभाषाओं की जननी है और उसने अपने
शब्द दान से इन भाषाओं को पोषित किया है। ये सभी हिंदू भाषाएं, जो
या तो संस्कृत से निकली हैं या संस्कृत से जुड़ी हैं, संस्कृत से ही पनपती
हैं और समृद्ध होती हैं। इसलिए संस्कृत भाषा हमेशा ही हिंदू युवकों के
शास्त्रीय पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग होनी चाहिए।
वही भाषण, 1939, पृ. 19-20
देवताओं की वाणी।
मूलतः संस्कृत।