पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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हिंदी को हिंदू जगत (हिंदूडम) की राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का यह अर्थ नहीं कि प्रांतीय भाषाओं से कोई अन्यायपूर्ण भेदभाव किया जा रहा है या उन्हें कोई नीचा दिखाया जा रहा है। हम सब अपनी प्रांतीय भाषाओं से उसी तरह जुड़े हुए हैं, जैसे हिंदी से और वे अपने-अपने क्षेत्रों में बढ़ेंगी और फूलें-फलेंगी। वास्तव में उनमें से कुछ तो साहित्य में बहुत प्रगतिशील और समृद्ध हैं। परंतु यदि सब बातों को ध्यान में रखें तो हिंदी ही राष्ट्रीय सर्व हिंदू भाषा के रूप में सर्वोत्तम बैठती है। यह भी याद रखना चाहिए कि हिंदी को जान-बूझकर राष्ट्रभाषा बनाने की बात नहीं कही गई। सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजों के या मुसलमानों के भारत आगमन से पूर्व हिंदी अपने सामान्य रूप में समूचे हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा बन चुकी थी। हिंदू तीर्थ यात्री, व्यापारी, पर्यटक, सिपाही, पंडित - सभी बंगाल से सिंध और कश्मीर से रामेश्वरम तक जाते थे और हर जगह अपनी बात हिंदी में समझाते थे। जैसे संस्कृत हिंदू बुद्धिजीवियों की राष्ट्रभाषा थी, वैसे ही कम से कम पिछले एक हजार वर्षों से हिंदी हिंदू जन-समुदाय की राष्ट्रभाषा या हिंदुस्तानी बोली रही है..........।
तथापि हिंदी से हमारा तात्पर्य ‘संस्कृतनिष्ठ हिंदी’ से है। उदाहरण के लिए, यह हिंदी जिसमें महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ लिखा है। इसमें विदेशी भाषा का एक भी अनावश्यक शब्द नहीं है और यह कितनी अच्छी तरह अभिव्यक्ति करती है। चलते-चलते यह कहा जा सकता है कि स्वामी दयानंद जी पहले हिंदू नेता थे जिन्होंने इस विचार को समझते-बूझते हुए निश्चित रूप दिया कि हिंदी ही भारत की सर्वहिंदू राष्ट्रीय भाषा हो सकती है। इस ‘संस्कृतनिष्ठ हिंदी’ का तथाकथित संकर हिंदुस्तानी से कोई वास्ता नहीं, जिसे वर्धा-स्कीम के अंतर्गत बढ़ावा दिया जा रहा है। यह भाषा की विरूपता के सिवाए और कुछ नहीं और इसे सख्ती से दबा दिया जाना चाहिए। न केवल यही, बल्कि हमारा यह भी कर्तव्य है कि हर हिंदू भाषा से, चाहे वह प्रांतीय भाषा हो या कोई बोली, अरबी और अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों को जोरदार ढंग से निकाल दिया जाए ......।
हमारा संस्कृत का अक्षर-विन्यास ध्वन्यात्मक है और विश्व में विकसित सबसे संपूर्ण लिपि है_ और हमारी लगभग सभी हिंदुस्तानी लिपियां इसका