126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अनुकरण करती हैं। नागरी लिपि भी इसी अक्षरक्रम को स्वीकार करती है।
हिंदी भाषा की तरह नागरी लिपि भी सारे हिंदुस्तान में कई शताब्दियों से
प्रचलित है और हिंदू साहित्यिक क्षेत्रों में तो लगभग दो सहस्र वर्षों से चल
रही है और इसे आमतौर पर ‘शास्त्री लिपि’ कहा जाने लगा है, अर्थात्
हमारे हिंदू शास्त्रों की लिपि। यह बात सर्वविदित है कि यदि बंगला या
गुजराती देवनागरी लिपि में छापी जाए तो कई अन्य प्रांतों के लोग भी उन्हें
समझने लगेंगे। समूचे हिंदुस्तान के लिए एक ही झटके में एक सर्वसामान्य
भाषा बना देना अव्यावहारिक और अबुद्धिमत्तापूर्ण है। परंतु समूचे हिंदू
जगत (हिंदूडम) के लिए नागरी लिपि को सर्वसामान्य लिपि के रूप में
अपनाना पूर्णतया संभव है। तथापि यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए
कि हमारे विभिन्न प्रांतों में प्रचलित विभिन्न हिंदू लिपियों का अपना एक
भविष्य है और वे नागरी के साथ-साथ फूलें-फलेंगी। इस समय तो समूचे
हिंदू जगत के समान हित के लिए ऐसा करना तत्काल आवश्यक है कि
हिंदू विद्यार्थियों के लिए हर स्व्Qूल में हिंदी भाषा के साथ-साथ नागरी लिपि
को भी अनिवार्य विषय बना दिया जाए।य्ऽ
श्री सावरकर की कल्पना के स्वराज में गैर-हिंदू अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति होगी, इस प्रश्न को लेकर उनका कथन हैः
फ्जब हिंदू महासभा एक बार ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के सिद्धांत को न
केवल स्वीकार कर ले बल्कि उस पर टिकी रहे और सरकारी नौकरियां
केवल योग्यता के आधार पर दी जाएं और इस बात को बुनियादी अधिकारों
और दायित्वों में शामिल कर लिया जाए जो सभी नागरिकों पर बिना धर्म
या जाति का विचार किए लागू होंगी, ......... तब सिद्धांततः अल्पसंख्यकों
के अधिकारों का उल्लेख करना न केवल अनावश्यक है, बल्कि परस्पर
विरोधी भी है क्योंकि इसमें पुनः सांप्रदायिक आधार पर बहुसंख्यक और
अल्पसंख्यक होने की बात उठ जाती है। परंतु जैसा कि व्यावहारिक राजनीति
की जरूरत है, और चूंकि हिंदू संगठनवादी यह नहीं चाहते कि गैर-हिंदुओं
में संदेह का एक कतरा भी रहे, अतः हम इस बात पर जोर देने को तैयार
हैं कि अल्पसंख्यकों के धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषायी वैध अधिकारों
की स्पष्ट रूप से गारंटी दी जाएगीः केवल एक शर्त पर कि बहुसंख्यकों
के समान अधिकारों में भी किसी किस्म का हस्तक्षेप या कमी न की जाए।
ऽ वही भाषण, 1939, पृ. 21, 22-23