पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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हर अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, अपने धर्म और संस्कृति की शिक्षा देने
के लिए अलग स्कूल खोल सकता है और इनके लिए सरकारी सहायता
भी प्राप्त कर सकता है - परंतु सदा केवल उस अनुपात में जिसमें वे
सरकारी खजाने में कर के रूप में धन जमा करते हों। वस्तुतः यही सिद्धांत
बहुसंख्यकों पर भी लागू होना चाहिए।
इन सबके अतिरिक्त, यदि संविधान संयुक्त निर्वाचक-मंडलों पर
आधारित नहीं है और ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के विशुद्ध राष्ट्रीय सिद्धांत
पर आधारित नहीं है, तब जो अल्पसंख्यक वर्ग पृथक निर्वाचक मंडल या
सुरक्षित सीटें चाहता है, उसे उसकी अनुमति दी जा सकती है, परंतु सदैव
उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही, बशर्ते उससे बहुसंख्यक भी जनसंख्या
में अपने अनुपात के आधार पर समान अधिकार से वंचित न हो जाएं।य् ख्1,
अल्पसंख्यकों की ऐसी स्थिति का सिंहावलोकन करने के बाद श्री सावरकर स्वराज की अपनी स्कीम का निष्कर्ष इन शब्दों में बताते हैंः
फ्हिंदुस्तान में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को यह अधिकार होगा कि उन्हें
समान नागरिक समझा जाए और उन्हें अपनी जनसंख्या के अनुपात में
समान संरक्षण ओर नागरिक अधिकार प्राप्त हों। हिंदू बहुसंख्यक किसी
भी गैर-हिंदू अल्पसंख्यक के वैध अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। परंतु
बहुसंख्यक किसी भी दशा में अपना वह अधिकार नहीं छोड़ेंगे, जो किसी
भी लोकतांत्रिक और वैध संविधान में बहुसंख्यक होने के नाते उन्हें मिलने
चाहिए। विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने अल्पसंख्यक रहकर हिंदुओं
पर कोई उपकार नहीं किया है और इसलिए जब उन्हें उनके अनुपात में
नागरिक और राजनीतिक अधिकारों का वैध हिस्सा मिल जाता है, तो उन्हें
अपनी उस स्थिति से संतुष्ट रहना चाहिए। यह बात तो एकदम हास्यास्पद
होगी कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के वाजिब अधिकारों पर
भी व्यवहारतः वीटो का अधिकार दे दिया जाए और उसे ‘स्वराज्य’ कहा
जाए। हिंदू केवल मालिकों में परिवर्तन नहीं चाहते, वे अपना युद्ध और
संघर्ष और मृत्यु का वरण केवल इसलिए नहीं कर रहे कि एडवर्ड की
जगह औरंगज़ेब महज इस आधार पर ले ले कि वह हिंदुस्तानी सीमाओं
में पैदा हुआ है_ बल्कि वे तो अपनी भूमि में अपने घर के मालिक स्वयं
बनना चाहते हैं।य् ख्2,
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