7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 139

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

साम्यताओं से बंधे हुए हैं, जिनके कारण हम अन्य किन्हीं भी गैर-हिंदू

लोगों, जैसे अंग्रेज, जापानी, यहां तक कि हिंदुस्तानी मुस्लिमों के सामने

खड़े होने पर निश्चित रूप से समजातीय लगते हैं। यही कारण है कि आज

हम हिंदुओं को कश्मीर से मद्रास तक और सिंध से आसाम तक स्वयं ही

एक राष्ट्र बनाना होगा।य्ऽ

श्री सावरकर का दूसरा प्रस्ताव, जिसके आधार पर उन्होंने अपनी योजना बनाई है, हिंदू शब्द की परिभाषाओं के बारे में है। श्री सावरकर की राय में हिंदू वह व्यक्ति हैंः

फ्जो इस भारत भूमि को सिंधु से सागर तक अपना समझता है और उसे

अपनी पितृभूमि और पुण्य भूमि मानता है, अर्थात् जहां उसके धर्म का

उदय हुआ, और उसकी आस्था का पालना बना।य्

इसलिए वैदिक ब्रह्म (ब्राह्मों) समाज, जैन, लिंगायत, सिख, आर्य-समाज

और भारतीय मूल के अन्य सभी धर्मों को मानने वाले लोग हिंदू हैं और

हिदूं मिलकर हिंदू जगत (हिंदूडम) का निर्णय करते हैं, अर्थात् सारे के

सारे हिंदू लोग हैं।

फलतः तथाकथित मूल निवासी (आदिमजाति) या पहाड़ी जनजातियां

भी हिंदू हैं, क्योंकि भारत उनकी पितृभूमि भी है और पुण्यभूमि भी, भले

ही वे धर्म को किसी भी रूप में मानते हों या पूजा करते हों। संस्कृत में

इस परिभाषा को इस रूप में कहा जा सकता हैः

।। आसिंधु सिंध पन्यंता यस्य भारत भूमिका।।

।। पितृभूः पुण्यभू श्रैव स वै हिंदुरितिस्मृतः।।

इसलिए इस परिभाषा को सरकार को स्वीकार कर लेना चाहिए,

और आगे होने वाली सरकारी जन-गणनाओं में हिंदुओं की गणना करते

समय इसे ही हिंदुत्व की कसौटी माना जाए।य्

‘हिंदू’ शब्द की यह परिभाषा बड़ी समझदारी और सावधानी से की गई है। यह इस ढंग की गई है कि इससे श्री सावरकर के दो उद्देश्य पूरे होते हैं। हिंदू होने के लिए यह अनिवार्य है कि मुस्लिमों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों को अलग रखते हुए वे भारत को पुण्य भूमि स्वीकारें। दूसरे बौद्धों, जैनियों, सिखों आदि को शामिल करने के लिए वेदों की पवित्रता पर आस्था रखने को जरूरी नहीं बनाया गया। तो श्री सावरकर और हिंदू महासभा की योजना ऐसी है परन्तु इसको देखने से पता चलता है कि इसमें कई आपत्तिजनक पहलू हैं।

ऽ वही, पृ. 14-17