7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 141

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

को वह वर्चस्व मिले जिसका वह अधिकारी है और मुस्ल्मि राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र के अधीनस्थ सहयोग की भावना से रहना होगा। राजनीतिक सत्ता के लिए इन दोनों राष्ट्रों के बीच चल रहे संघर्ष में श्री सावरकर सबके लिए, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ का नियम चाहते हैं। इस योजना में मुस्लिम को ऐसा कोई लाभ नहीं मिलता, जो हिंदू को न मिलता हो। अल्पसंख्यकों को उनका न्यायोचित अधिकार न देकर उन्हें दंडित करना न्यायोचित नहीं है। राज्य मुस्लिमों को इस बात की गारंटी देगा कि मुस्लिम धर्म और मुस्लिम संस्कृति के अनुसार उन्हें राजनीतिक सत्ता मिले। परंतु उन्हें विधानसभा और प्रशासन में सीटों और नौकरियों की गारंटी नहीं देगा। यदि मुस्लिम ऐसी गारंटी मांगने पर जोर देंगे तो गारंटी का कोटा देश की जनसंख्या में उनके अनुपात से अधिक नहीं होगा।ऽ इस तरह मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व में वज़न न देकर श्री सावरकर मुस्लिमों को उन सुविधाओं से भी वंचित कर देते हैं, जो उन्होंने अब तक प्राप्त की हैं।

पाकिस्तान के बारे में श्री सावरकर का विकल्प अधिक स्पष्ट, साहसपूर्ण और निर्णायक है, जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में कांग्रेस की अनियमित, अस्पष्ट और अनिश्चित घोषणाओं से बिल्कुल भिन्न लगता है। श्री सावरकर की योजना में कम से कम यह विशेषता तो है ही कि उसमें मुस्लिमों को बता दिया गया है कि उन्हें इससे अधिक और कुछ नहीं मिलेगा। मुस्लिमों को यह पता है कि हिंदू महासभा की दृष्टि में उनकी क्या स्थिति है। दूसरी ओर, कांग्रेस के साथ मुसलमानों को यह पता ही नहीं होता कि उनकी क्या स्थिति है, क्योंकि कांग्रेस मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर दोहरी नीति नहीं तो कम से कम कूटनीति अवश्य अपना रही है।

इसी के साथ यह भी कहना पड़ेगा कि श्री सावरकर का दृष्टिकोण यदि विचित्र नहीं तो तर्कसंगत भी नहीं है। श्री सावरकर यह मानते हैं कि मुस्लिम एक अलग राष्ट्र हैं। वे यह भी स्वीकार कर लेते हैं कि उन्हें सांस्कृतिक स्वायत्तता का अधिकार है। वह उन्हें अपना पृथक राष्ट्रीय ध्वज रखने की भी अनुमति देते हैं। पर इसके बावजूद वे मुस्लिम राष्ट्र के लिए अलग कौमी वतन की अनुमति नहीं देते। यदि वे हिंदू राष्ट्र के लिए एक अलग कौमी वतन का दावा करते हैं, तो मुस्लिम राष्ट्र के कौमी वतन के दावे का विरोध कैसे कर सकते हैं?

यदि श्री सावरकर की एकमात्र त्रुटि उनकी असंगति ही होती तो यह कोई बहुत

ऽ यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि श्री सावरकर मुस्लिमों के लिए पृथक निवा्रचक-मंडल के विरोधी

नहीं हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या वह वहां भी मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल के हामी हैं

जहां वे बहुसंख्यक हैं।