7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 142

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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चिंता का विषय नहीं था। परंतु अपनी योजना का समर्थन करके वे भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं। जब एक बड़े राष्ट्र को एक छोटे राष्ट्र से उस हालत में वास्ता पड़ता है, जब वे उसी देश के नागरिक हैं और एक ही संविधान के अंतर्गत रहते हैं तो इतिहास में उनके लिए दो रास्तों का उल्लेख मिलता है। एक तो यह है कि छोटे राष्ट्र की कौमियत को खत्म कर दिया जाए और उनसे बड़ा राष्ट्र अपने में मिला ले, आत्मसात कर ले, जिससे दो कि जगह एक राष्ट्र को उसकी भाषा, धर्म या संस्कृति के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और उसके ऊपर बड़े राष्ट्र की भाषा, धर्म और संस्कृति थोप दी जाती है। दूसरा तरीका यह है कि देश का विभाजन कर दिया जाए और छोटे राष्ट्र को एक अलग स्वायत्तता और प्रभुसत्ता रखने दी जाए जिसका बड़े राष्ट्र से अलग स्वतंत्र अस्तित्व हो। दोनों तरीकों को ऑस्ट्रिया और तुर्की में अपनाने की चेष्टा की गई, दूसरा तरीका पपहले तरीके की असफलता के बाद अपनाया गया।

श्री सावरकर इन दोनों में से कोई भी तरीका नहीं अपनाते। उनका विचार मुस्ल्मि राष्ट्र का दमन करने का नहीं है। इसके विपरीत वे तो उन्हें किसी राष्ट्र की ही तरह अपना धर्म, भाषा, और संस्कृति बनाए रखने की अनुमति देते हैं। परंतु इसी के साथ-साथ देश को विभाजित करने की अनुमति नहीं देते, जिससे दोनों राष्ट्र अलग हो जाएं, स्वायत्तशासी राज्य बनें और अपने-अपने प्रदेश में पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न हो सकें। वह चाहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्रों की तरह एक ही देश में रहें और प्रत्येक अपना-अपना धर्म, भाषा और संस्कृति बनाए रखें। एक आदमी इस बात को तो समझ सकता है और इसकी सराहना भी कर सकता है कि बड़ा राष्ट्र छोटे राष्ट्र को दबा दे, क्योंकि अंततः लक्ष्य तो एक ही राष्ट्र बनाकर रखने का है। परंतु कोई आदमी इस बात के लाभ को नहीं समझ सकता कि ऐसे सिद्धांत का क्या लाभ जो यह कहे कि दो राष्ट्र तो हमेशा बने रहें, परंतु उनमें तलाक नहीं हो सकता। इस दृष्टिकोण का समर्थन केवल उसी दशा में किया जा सकता है जब दोनों राष्ट्र भागीदारों की तरह मित्रतापूर्वक रहें और एक-दूसरे का आदर करें। परंतु ऐसा तो होगा नहीं, क्योंकि श्री सावरकर मुस्लिम राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र के बराबर अधिकार या सत्ता नहीं देंगे। वे चाहते हैं कि हिंदू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र के बीच शत्रुता के बीज बो देने के बाद वे एक साथ, एक ही विधान के अंतर्गत, एक ही देश में रहें। सावरकर यह क्यों चाहते हैं, इसकी व्याख्या करना कठिन है।

श्री सावरकर को यह श्रेय नहीं दिया जा सकता कि उन्होंने कोई नया सूत्र ढूंढ निकाला है। श्री सावरकर के इस विश्वास को समझना कठिन है कि उनका सूत्र ठीक है। उन्होंने स्वराज की अपनी योजना को पुराने ऑस्ट्रिया और पुराने तुर्की के नमूने और