134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ढांचे पर आधारित किया है। उन्होंने देखा कि ऑस्ट्रिया और तुर्की में एक बड़े राष्ट्र की छाया में अन्य छोटे राज्य रहते थे, जो एक विधान से बंधे हुए थे और उस बड़े राष्ट्र का छोटे राष्ट्रों पर प्रभुत्व रहता था। फिर वे तर्क देते हैं कि यदि वह ऑस्ट्रिया या तुर्की में संभव है तो हिंदुस्तान में हिंदुओं के लिए वैसा करना क्यों संभव नहीं?
यह बात वास्तव में बड़ी विचित्र है कि श्री सावरकर ने पुराने ऑस्ट्रिया और पुराने तुर्की को (अपने विचार-प्रतिपादन के लिए) नमूने या आदर्श के रूप में अपनाया। ऐसा लगता है कि श्री सावरकर शायद यह नहीं जानते कि अब पुराना ऑस्ट्रिया और पुराना तुर्की बचे ही नहीं। शायद उन्हें उन ताकतों का तो बिल्कुल ही नहीं पता जिन्होंने पुराने ऑस्ट्रिया और पुराने तुर्की के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। यदि वह अतीत की बातों का अध्ययन करने की जगह, जिसके वे बड़े शौकीन हैं, वर्तमान पर ध्यान देते तो उन्हें पता चल जाता कि चूंकि पुराने ऑस्ट्रिया और पुराने तुर्की ने किस योजना को बनाए रखने पर भारी जोर दिया, उसी की वजह से उनका विनाश हो गया_ और श्री सावरकर अपने हिंदू जगत से उसी योजना को अपनाने के लिए कह रहे हैं जिसके अंतर्गत एक ऐसा स्वराज स्थापित किया जाएगा जहां दो राष्ट्र एक ही विधान के अंतर्गत रहेंगे और जिसमें बड़ा राष्ट्र छोटे राष्ट्र को अपने अधीनस्थ रखने के लिए स्वतंत्र होगा।
भारत के लिए ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया और तुर्की के विखंडन का इतिहास अत्यधिक महत्व का है और हिंदू महासभा के सदस्यों को उसे पढ़ने से बहुत लाभ होगा। मुझे यहां उसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं, क्योंकि उनके इतिहास के महत्वपूर्ण सबक की चर्चा मैं एक अन्य अध्ययन में कर चुका हूं। यहां इतना कहना ही पर्याप्त है कि श्री सावरकर द्वारा तैयार की गई स्वराज की योजना से हिंदुओं को मुस्लिमों पर एक साम्राज्य स्थापित करने का मौका तो मिल जाएगा, जिससे उनका साम्राज्यवादी जाति बनने का अहम पूरा हो जाएगा, परन्तु इससे हिंदुओं के लिए स्थाई और शांतिपूर्ण भविष्य कभी सुनिश्चित नहीं हो सकेगा। जिसका सीधा-सादा कारण यह है कि मुस्लिम ऐसे खतरनाक विकल्प को कभी भी अपनी इच्छा से स्वीकार नहीं करेंगे।
III
श्री सावरकर को अपनी योजना के बारे में मुस्लिमों की प्रतिक्रिया की कोई चिंता नहीं है। वह अपनी योजना तैयार करते हैं और फिर उसे मुस्लिमों के मुंह पर मारते हुए कहते हैं - ‘या तो इसे मान लो या इसे छोड़ दो।’ स्वराज के लिए संघर्ष में