7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 144

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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शामिल होने से मुसलमानों द्वारा इंकार करने से उन्हें कोई परेशानी नहीं है। वे हिंदुओं और हिंदू महासभा की ताकत के बारे में पूरी तरह आश्वस्त हैं और इस आशा में बिना किसी की सहायता के अपना संघर्ष अकेले ही चलाने को तैयार हैं कि हिंदू अंग्रेज से स्वराज प्राप्त कर लेंगे। वह मुसलमानों को यह बताने के लिए बिल्कुल तैयार हैंः

फ्यदि आप आते हैं, तो आप के साथ, यदि आप नहीं आते तो आपके

बिना, और यदि आप विरोध करते हैं तो उसके बावजूद, हिंदू अपनी पूरी

ताकत से राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।य्

श्री गांधी ऐसा नहीं कहते। हिंदुस्तान के एक राजनीतिक नेता के रूप में अपना जीवन शुरू करते समय ही उन्होंने हिंदुस्तान के लोगों से यह वायदा कर उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया था कि वह छह महीने में ही स्वराज पा लेंगे। श्री गांधी ने कहा कि उनके इस करिश्मे को पूरा करने के लिए कुछ शर्तें पूरी की जानी जरूरी हैं। उनमें से एक है हिंदू-मुस्लिम एकता। श्री गांधी यह कहते हुए कभी नहीं थकते कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वराज हो ही नहीं सकता। उन्होंने यह नारा हिंदुस्तान की राजनीति के प्रचार मात्र के रूप में प्रचलित नहीं किया, बल्कि उसे पूरा करने के लिए प्रयत्न भी किया। कहा जा सकता है कि श्री गांधी ने भारत के राजनीतिक नेतृत्व का आरंभ 2 मार्च, 1919 के उस घोषणापत्र के जरिए किया जिसमें उन्होंने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू करने की अपनी इच्छा व्यक्त की और आह्वान किया कि जो इसमें शामिल होना चाहते हैं, वे सत्याग्रह प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करें। सत्याग्रह का यह आंदोलन अल्पकालीन आंदोलन था और श्री गांधी ने इसे 18 अप्रैल, 1919 को स्थगित कर दिया था। अपने कार्यक्रम के एक भाग के रूप में श्री गांधी ने आह्वान किया कि 6 मार्च, 1919 सारे देश में रॉलेट एक्ट के विरोध-दिवस के रूप में मनाया जाए। उस दिन आम सभाएं की जानी थीं और श्री गांधी ने उन सभाओं में भाग लेने वालों को यह प्रतिज्ञा लेने के लिए कहा थाःऽ

फ्भगवान को साक्षी मानकर, हम हिंदू और मुसलमान यह घोषणा करते हैं

कि हम एक ही माता-पिता की संतान की तरह आपस में व्यवहार करेंगे,

हम आपस में कोई मतभेद नहीं रखेंगे, हममें से एक का दुःख बाकी सबका

दुःख होगा और हममें से प्रत्येक उसे दूर करने की कोशिश करेगा। हम

एक-दूसरे के धर्म और धार्मिक भावनाओं का आदर करेंगे और एक-दूसरे

के धार्मिक रीति-रिवाजों में किसी प्रकार की बाधा नहीं डालेंगे। हम धर्म

के नाम पर एक-दूसरे के विरुद्ध हिंसा करने से बचेंगे।य्

ऽ देखिए, दिनांक 23 मार्च, 1919 का उनका घोषणापत्र।